महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तमास्त्रेण महता ज्यौतिषेणार्जुनोऽवधीत् ॥ २४ ॥
उस महासमरमें प्रकट हुए उस भयदायक घोर एवं भयानक अंधकारको अर्जुनने अपने विशाल उत्तम ज्योतिर्मय अस्त्रद्वारा नष्ट कर दिया ॥ २४ ॥
हते तस्मिञ्जलौघास्तु प्रादुरासन् भयानकाः ।
अम्भसस्तस्य नाशार्थमादित्यास्त्रमथार्जुनः ॥ २५ ॥
प्रायुङ्क्ताम्भस्ततस्तेन प्रायशोऽस्त्रेण शोषितम् ।
उस अंधकारका निवारण हो जानेपर बड़े भयंकर जलप्रवाह प्रकट होने लगे। तब अर्जुनने उस जलके निवारणके लिये आदित्यास्त्रका प्रयोग किया। उस अस्त्रने वहाँका सारा जल सोख लिया ॥ २५ १/२ ॥
एवं बहुविधा मायाः सौबलस्य कृताः कृताः ॥ २६ ॥
जघानास्त्रबलेनाशु प्रहसन्नर्जुनस्तदा ।
इस प्रकार सुबलपुत्र शकुनिके द्वारा बारंबार प्रयुक्त हुई नाना प्रकारकी मायाओंको उस समय अर्जुनने अपने अस्त्रबलसे हँसते-हँसते शीघ्र ही नष्ट कर दिया ॥ २६ १/२ ॥
तदा हतासु मायासु त्रस्तोऽर्जुनशराहतः ॥ २७ ॥
अपायाज्जवनैरश्वैः शकुनिः प्राकृतो यथा ।
तब मायाओंका नाश हो जानेपर अर्जुनके बाणोंसे आहत एवं भयभीत होकर शकुनि अधम मनुष्योंकी भाँति तेज चलनेवाले घोड़ोंके द्वारा भाग खड़ा हुआ ॥ २७ १/२ ॥
ततोऽर्जुनोऽस्त्रविच्छैघ्यं दर्शयन्नात्मनोऽरिषु ॥ २८ ॥
अभ्यवर्षच्छरौघेन कौरवाणामनीकिनीम् ।
तदनन्तर अस्त्रोंके ज्ञाता अर्जुन शत्रुओंको अपनी फुर्ती दिखाते हुए कौरव-सेनापर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ २८ १/२ ॥
सा हन्यमाना पार्थेन तव पुत्रस्य वाहिनी ॥ २९ ॥
द्वैधीभूता महाराज गङ्गेवासाद्य पर्वतम् ।
महाराज! अर्जुनके द्वारा मारी जाती हुई आपके पुत्रकी विशाल सेना उसी प्रकार दो भागोंमें बट गयी, मानो गंगा किसी विशाल पर्वतके पास पहुँचकर दो धाराओंमें विभक्त हो गयी हों ॥ २९ १/२ ॥
द्रोणमेवान्वपद्यन्त केचित् तत्र नरर्षभाः ॥ ३० ॥
केचिद् दुर्योधनं राजन्नर्द्यमानाः किरीटिना ।
राजन्! किरीटधारी अर्जुनसे पीड़ित हो आपकी सेनाके कितने ही नरश्रेष्ठ द्रोणाचार्यके पीछे जा छिपे और कितने ही सैनिक राजा दुर्योधनके पास भाग गये ॥ ३० १/२ ॥
नापश्याम ततस्त्वेनं सैन्ये वै रजसावृते ॥ ३१ ॥
गाण्डीवस्य च निर्घोषः श्रुतो दक्षिणतो मया ।