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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2480, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2480

पञ्चालाश्चेदयश्चैव द्रौपदेयाश्च सर्वशः ॥ १५ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च सर्वे चापि प्रभद्रकाः ।
विक्रमं मम पश्यन्तु धनुषश्च महद् बलम् ॥ १६ ॥
आज सब लोग मुझे रणभूमिमें निर्भय विचरते देखें, आज समस्त पाण्डव, श्रीकृष्ण, सात्यकि, पांचाल और चेदिदेशके योद्धा, द्रौपदीके सभी पुत्र, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा समस्त प्रभद्रकगण मेरा पराक्रम तथा मेरे धनुषका महान् बल अपनी आँखों देख लें ॥ १४—१६ ॥

लाघवं चास्त्रवीर्यं च भुजयोश्च बलं युधि ।
अद्य पश्यन्तु मे पार्थाः सिद्धाश्च सह चारणैः ॥ १७ ॥
यादृशं मे बलं बाह्वोः सम्पदस्त्रेषु या च मे ।
अद्य मे विक्रमं दृष्ट्वा पाण्डवानां महारथाः ॥ १८ ॥
प्रतीकारपरा भूत्वा चेष्टन्तां विविधाः क्रियाः ।
आज कुन्तीके सभी पुत्र तथा चारणोंसहित सिद्धगण भी युद्धमें मेरी फुर्ती, अस्त्र-बल और बाहुबलको देखें। मेरी दोनों भुजाओंमें जैसा बल है तथा अस्त्रोंका मुझे जैसा ज्ञान है, उसके अनुसार आज मेरा पराक्रम देखकर पाण्डव महारथी उसके प्रतीकारमें तत्पर हो नाना प्रकारके कार्योंके लिये सचेष्ट हों ॥ १७-१८ १/२ ॥

अद्य सैन्यानि पाण्डूनां द्रावयिष्ये समन्ततः ॥ १९ ॥
द्रोणभीष्मावति विभो सूतपुत्रं च संयुगे ।
विचरिष्ये रणे युध्यन् प्रियार्थं तव कौरव ॥ २० ॥
कुरुनन्दन! आज मैं पाण्डवोंकी सेनाओंको चारों ओर भगा दूँगा। प्रभो! युद्धस्थलमें तुम्हारा प्रिय करनेके लिये आज मैं द्रोणाचार्य, भीष्म तथा सूतपुत्र कर्णसे भी बढ़कर पराक्रम दिखाता और जूझता हुआ रणभूमिमें सब ओर विचरण करूँगा ॥ १९-२० ॥

संजय उवाच

अभिषिक्ते तथा शल्ये तव सैन्येषु मानद ।
न कर्णव्यसनं किंचिन्मेनिरे तत्र भारत ॥ २१ ॥
**संजय कहते हैं—**मानद! भरतनन्दन! इस प्रकार आपकी सेनाओंमें राजा शल्यका अभिषेक होनेपर समस्त योद्धाओंको कर्णके मारे जानेका थोड़ा-सा भी दुःख नहीं रह गया ॥ २१ ॥

हृष्टाः सुमनसश्चैव बभूवुस्तत्र सैनिकाः ।
मेनिरे निहतान् पार्थान् मद्रराजवशं गतान् ॥ २२ ॥
वे सब-के-सब प्रसन्नचित्त होकर हर्षसे भर गये और यह मानने लगे कि कुन्तीके पुत्र मद्रराज शल्यके वशमें पड़कर अवश्य ही मारे जायँगे ॥ २२ ॥