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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 241

ततोऽर्जुनः सुशर्माणं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः ।
ध्वजं धनुश्चास्य तथा क्षुराभ्यां समकृन्तत ॥ ७ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने सुशर्माको सात बाणोंसे घायल करके दो क्षुरोंद्वारा उसके ध्वज और धनुषको काट डाला ॥ ७ ॥

त्रिगर्ताधिपतेश्चापि भ्रातरं षड्भिराशुगैः ।
साश्वं ससूतं त्वरितः पार्थः प्रैषीद् यमक्षयम् ॥ ८ ॥
साथ ही त्रिगर्तराजके भाईको भी छः बाण मारकर अर्जुनने उसे घोड़े और सारथिसहित तुरंत यमलोक भेज दिया ॥ ८ ॥

ततो भुजगसंकाशां सुशर्मा शक्तिमायसीम् ।
चिक्षेपार्जुनमादिश्य वासुदेवाय तोमरम् ॥ ९ ॥
तदनन्तर सुशर्माने सर्पके समान आकृतिवाली लोहेकी बनी हुई एक शक्तिको अर्जुनके ऊपर चलाया और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णपर तोमरसे प्रहार किया ॥ ९ ॥

शक्तिं त्रिभिः शरैश्छित्त्वा तोमरं त्रिभिरर्जुनः ।
सुशर्माणं शरव्रातैर्मोहयित्वा न्यवर्तयत् ॥ १० ॥
अर्जुनने तीन बाणोंद्वारा शक्ति तथा तीन बाणोंद्वारा तोमरको काटकर सुशर्माको अपने बाणसमूहोंद्वारा मोहित करके पीछे लौटा दिया ॥ १० ॥

तं वासवमिवायान्तं भूरिवर्षं शरौघिनम् ।
राजंस्तावकसैन्यानां नोग्रं कश्चिदवारयत् ॥ ११ ॥
राजन्! इसके बाद वे इन्द्रके समान बाण-समूहोंकी भारी वर्षा करते हुए जब आपकी सेनापर आक्रमण करने लगे, उस समय आपके सैनिकोंमेंसे कोई भी उन उग्ररूपधारी अर्जुनको रोक न सका ॥ ११ ॥

ततो धनंजयो बाणैः सर्वानैव महारथान् ।
आयाद् विनिघ्नन् कौरव्यान् दहन् कक्षमिवानलः ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् जैसे अग्नि घास-फूँसके समूहको जला डालती है, उसी प्रकार अर्जुन अपने बाणोंद्वारा समस्त कौरव महारथियोंको क्षत-विक्षत करते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥ १२ ॥

तस्य वेगमसह्यं तं कुन्तीपुत्रस्य धीमतः ।
नाशक्नुवंस्ते संसोढुं स्पर्शमग्नेरिव प्रजाः ॥ १३ ॥
परम बुद्धिमान् कुन्तीपुत्रके उस असह्य वेगको कौरव-सैनिक उसी प्रकार नहीं सह सके, जैसे प्रजा अग्निका स्पर्श नहीं सहन कर पाती ॥ १३ ॥

संवेष्टयन्ननीकानि शरवर्षेण पाण्डवः ।
सुपर्णपातवद् राजन्नायात् प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ १४ ॥
राजन्! अर्जुनने बाणोंकी वर्षासे कौरव-सेनाओंको आच्छादित करते हुए गरुड़के समान वेगसे भगदत्तपर आक्रमण किया ॥ १४ ॥