सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2380, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2380

राजन्! उस उत्तम बाणको धनुषपर चढ़ाते ही पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वी डगमगाने लगी ॥ २६ ॥
ववौ सशर्करो वायुर्दिशश्च रजसा वृताः ।
हाहाकारश्च संजज्ञे सुराणां दिवि भारत ॥ २७ ॥
भारत! कंकड़ोंकी वर्षा करती हुई प्रचण्ड वायु चलने लगी। सम्पूर्ण दिशाओंमें धूल छा गयी और स्वर्गके देवताओंमें भी हाहाकार मच गया ॥ २७ ॥
तमिषुं संधितं दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मारिष ।
विषादं परमं जग्मुः पाण्डवा दीनचेतसः ॥ २८ ॥
माननीय नरेश! जब सूतपुत्रने उस बाणका संधान किया, उस समय उसे देखकर समस्त पाण्डव दीनचित्त हो बड़े भारी विषादमें डूब गये ॥ २८ ॥
स सायकः कर्णभुजप्रमुक्तः
शक्राशनिप्रख्यर्रुचिः शिताग्रः ॥ २९ ॥
भुजान्तरं प्राप्य धनंजयस्य
विवेश वल्मीकमिवोरगोत्तमः ।
कर्णके हाथसे छूटा हुआ वह बाण इन्द्रके वज्रके समान प्रकाशित हो रहा था। उसका अग्रभाग बहुत तेज था। वह अर्जुनकी छातीमें जा लगा और जैसे उत्तम सर्प बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार वह उनके वक्षःस्थलमें समा गया ॥
स गाढविद्धः समरे महात्मा
विघूर्णमानः श्लथहस्तगाण्डिवः ॥ ३० ॥
चचाल बीभत्सुरमित्रमर्दनः
क्षितेः प्रकम्पे च यथाचलोत्तमः ।
समरांगणमें उस बाणकी गहरी चोट खाकर महात्मा अर्जुनको चक्कर आ गया। गाण्डीव धनुषपर रखा हुआ उनका हाथ ढीला पड़ गया और वे शत्रुमर्दन अर्जुन भूकम्पके समय हिलते हुए श्रेष्ठ पर्वतके समान काँपने लगे ॥ ३० ½ ॥
तदन्तरं प्राप्य वृषो महारथो
रथाङ्गमुर्वीगतमुज्जिहीर्षुः ॥ ३१ ॥
रथादवप्लुत्य निगृह्य दोर्भ्यां
शशाक दैवान्न महाबलोऽपि ।
इसी बीचमें मौका पाकर महारथी कर्णने धरतीमें धँसे हुए पहियेको निकालनेका विचार किया। वह रथसे कूद पड़ा और दोनों हाथोंसे पकड़कर उसे ऊपर उठानेकी कोशिश करने लगा; परंतु महाबलवान् होनेपर भी वह दैववश अपने प्रयासमें सफल न हो सका ॥ ३१ ½ ॥
ततः किरीटी प्रतिलभ्य संज्ञां