महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2325, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदोनोंके आदेशका गौरव रखते हुए युद्धसे निवृत्त हो जायँगे।
रक्ष दुर्योधनात्मानमात्मा सर्वस्य भाजनम् ।।
जीवने यत्नमातिष्ठ जीवन् भद्राणि पश्यति ।
‘दुर्योधन! तुम स्वयं ही अपनी रक्षा करो। आत्मा ही सब सुखोंका भाजन है। तुम जीवन-रक्षाके लिये प्रयत्न करो। जीवित रहनेवाला पुरुष ही कल्याणका दर्शन करता है।
राज्यं श्रीश्चैव भद्रं ते जीवमाने तु कल्पते ।।
मृतस्य खलु कौरव्य नैव राज्यं कुतः सुखम् ।
‘तुम्हारा कल्याण हो; तुम जीवित रहोगे, तभी तुम्हें राज्य और लक्ष्मीकी प्राप्ति हो सकती है। कुरुनन्दन! मरे हुएको राज्य नहीं मिलता, फिर सुख कैसे प्राप्त हो सकता है?।
लोकवृत्तमिदं वृत्तं प्रवृत्तं पश्य भारत ।।
शाम्य त्वं पाण्डवैः सार्धं शेषं कुरुकुलस्य च ।
‘भारत! लोकमें घटित होनेवाले इस प्रचलित व्यवहारकी ओर दृष्टिपात करो; पाण्डवोंके साथ संधि कर लो और कौरवकुलको शेष रहने दो।
मा भूत् स कालः कौरव्य यदाहमहितं वचः ।।
ब्रूयां कामं महाबाहो मावमंस्था वचो मम ।
‘कुरुनन्दन! ऐसा समय कभी न आवे जब कि मैं इच्छानुसार तुमसे कोई अहितकर बात कहूँ; अतः महाबाहो! तुम मेरी बातका अनादर न करो।
धर्मिष्ठमिदमत्यर्थं राज्ञश्चैव कुलस्य च ।।
एतद्धि परमं श्रेयः कुरुवंशस्य वृद्धये ।
‘मेरा यह कथन धर्मके अनुकूल तथा राजा और राजकुलके लिये अत्यन्त हितकर है; यह कौरववंशकी वृद्धिके लिये परम कल्याणकारी है।
प्रजाहितं च गान्धारे कुलस्य च सुखावहम् ।।
पथ्यमायतिसंयुक्तं कर्णोऽप्यर्जुनमाहवे ।
न जेष्यति नरव्याघ्रमिति मे निश्चिता मतिः ।।
रोचतां ते नरश्रेष्ठ ममैतद् वचनं शुभम् ।
अतोऽन्यथा हि राजेन्द्र विनाशः सुमहान् भवेत् ॥
‘गान्धारीनन्दन! मेरा यह वचन प्रजाजनोंके लिये हितकर, इस कुलके लिये सुखदायक, लाभकारी तथा भविष्यमें भी मंगलकारक है। नरश्रेष्ठ! मेरी यह निश्चित धारणा है कि कर्ण नरव्याघ्र अर्जुनको कदापि जीत न सकेगा; अतः मेरा यह शुभ वचन तुम्हें पसंद आना चाहिये। राजेन्द्र! यदि ऐसा नहीं हुआ तो बड़ा भारी विनाश होगा।
इदं च दृष्टं जगता सह त्वया
कृतं यदेकेन किरीटमालिना ।
यथा न कुर्याद् बलभिन्न चान्तको