महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2248, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमारे गये हाथियों, मनुष्यों और घोड़ोंसे; टूट-फूटकर बिखरे हुए अनेकानेक रथोंसे; शस्त्र, यन्त्र तथा कवचोंसे रहित हुए युद्धकुशल प्राणशून्य योद्धाओंसे और इधर-उधर फेंके हुए आयुधोंसे अर्जुनने वहाँके मार्गको आच्छादित कर दिया था ।। १४ १/२ ।।
व्यस्फारयद् वै गाण्डीवं सुमहद् भैरवारवम् ।। १५ ।।
घोरवज्रविनिष्पेषं स्तनयित्नुरिवाम्बरे ।
उन्होंने आकाशमें मेघके समान भयानक वज्रपातके शब्दको तिरस्कृत करनेवाले भयंकर स्वरमें अपने विशाल गाण्डीव धनुषकी टंकार की ।। १५ १/२ ।।
ततः प्रादीर्यत चमूर्धनंजयशराहता ।। १६ ।।
महावातसमाविद्धा महानौरिव सागरे ।
तदनन्तर अर्जुनके बाणोंसे आहत हुई कौरव-सेना समुद्रमें उठे तूफानसे टकराये हुए जहाजके समान विदीर्ण हो उठी ।। १६ १/२ ।।
नानारूपाः प्राणहराः शरा गाण्डीवचोदिताः ।। १७ ।।
अलातोल्काशनिप्रख्यास्तव सैन्यं विनिर्दहन् ।
गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए प्राण लेनेवाले नाना प्रकारके बाण जो अलात, उल्का और बिजलीके समान प्रकाशित हो रहे थे, आपकी सेनाको दग्ध करने लगे ।। १७ १/२ ।।
महागिरौ वेणुवनं निशि प्रज्वलितं यथा ।। १८ ।।
तथा तव महासैन्यं प्रास्फुरच्छरपीडितम् ।
जैसे रात्रिकालमें किसी महान् पर्वतपर बाँसोंका वन जल रहा हो, उसी प्रकार अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हुई आपकी विशाल सेना आगकी लपटोंसे घिरी हुई-सी प्रतीत हो रही थी ।। १८ १/२ ।।
संपिष्टदग्धविध्वस्तं तव सैन्यं किरीटिना ।। १९ ।।
कृतं प्रविहतं बाणैः सर्वतः प्रद्रुतं दिशः ।
किरीटधारी अर्जुनने आपकी सेनाको पीस डाला, चला दिया, विध्वस्त कर दिया, बाणोंसे बींध डाला और सम्पूर्ण दिशाओंमें भगा दिया ।। १९ १/२ ।।
महावने मृगगणा दावाग्नित्रासिता यथा ।। २० ।।
कुरवः पर्यवर्तन्त निर्दग्धाः सव्यसाचिना ।
जैसे विशाल वनमें दावानलसे डरे हुए मृगोंके समूह इधर-उधर भागते हैं, उसी प्रकार सव्यसाची अर्जुनके बाणरूपी अग्निसे चलते हुए कौरव-सैनिक चारों ओर चक्कर काट रहे थे ।। २० १/२ ।।
उत्सृज्य च महाबाहुं भीमसेनं तथा रणे ।। २१ ।।
बलं कुरूणामुद्विग्नं सर्वमासीत् पराङ्मुखम् ।