महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअब मैं पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरको वधके योग्य नहीं मानता। मेरी इस मानसिक प्रतिज्ञाके विषयमें आप ही कोई अनुग्रह (भाईका वध किये बिना ही प्रतिज्ञाकी रक्षाका उपाय) बताइये। मेरे मनमें जो यहाँ कहनेयोग्य उत्तम बात है, इसे पुनः सुन लीजिये ।। ७०-७१ ।।
जानासि दाशार्ह मम व्रतं त्वं
यो मां ब्रूयात् कश्चन मानुषेषु ।
अन्यस्मै त्वं गाण्डिवं देहि पार्थ
त्वत्तोऽस्त्रैर्वा वीर्यतो वा विशिष्टः ।। ७२ ।।
हन्यामहं केशव तं प्रसह्म
भीमो हन्यात् तूबरकेति चोक्तः ।
तन्मे राजा प्रोक्तवांस्ते समक्षं
धनुर्देहीत्यसकृद् वृष्णिवीर ।। ७३ ।।
दाशार्हकुलनन्दन! आप तो यह जानते ही हैं कि मेरा व्रत क्या है? मनुष्योंमेंसे जो कोई भी मुझसे यह कह दे कि ‘पार्थ! तुम अपना गाण्डीव धनुष किसी दूसरे ऐसे पुरुषको दे दो जो अस्त्रोंके ज्ञान अथवा बलमें तुमसे बढ़कर हो; तो केशव! मैं उसे बलपूर्वक मार डालूँ।’ इसी प्रकार भीमसेनको कोई ‘मूँछ-दाढ़ीरहित’ कह दे तो वे उसे मार डालेंगे, वृष्णिवीर! राजा युधिष्ठिरने आपके सामने ही बारंबार मुझसे कहा है कि ‘तुम अपना धनुष दूसरेको दे दो’ ।। ७२-७३ ।।
तं हन्यां चेत् केशव जीवलोके
स्थाता नाहं कालमप्यल्पमात्रम् ।
ध्यात्वा नूनं ह्येनसा चापि मुक्तो
वधं राज्ञो भ्रष्टवीर्यो विचेताः ।। ७४ ।।
केशव! यदि मैं युधिष्ठिरको मार डालूँ तो इस जीव-जगत्मे थोड़ी देर भी मैं जीवित नहीं रह सकता। यदि किसी तरह पापसे छूट जाऊँ तो भी राजा युधिष्ठिरके वधका चिन्तन करके जी नहीं सकता। निश्चय ही इस समय मैं किंकर्तव्यविमूढ़ होकर पराक्रमशून्य और अचेत-सा हो गया हूँ ।। ७४ ।।
यथा प्रतिज्ञा मम लोकबुद्धौ
भवेत् सत्या धर्मभृतां वरिष्ठ ।
यथा जीवेत् पाण्डवोऽहं च कृष्ण
तथा बुद्धिं दातुमप्यर्हसि त्वम् ।। ७५ ।।
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! संसारके लोगोंकी समझमें जिस प्रकार मेरी प्रतिज्ञा सच्ची हो जाय और जिस प्रकार पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर और मैं दोनों जीवित रह सकें, वैसी कोई सलाह आप मुझे देनेकी कृपा करें ।। ७५ ।।