सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2132, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2132

है? ॥ ६ ॥
कस्माद् भवान् महाखड्गं परिगृह्णाति सत्वरः ।
तत् त्वां पृच्छामि कौन्तेय किमिदं ते चिकीर्षितम् ॥ ७ ॥
परामृशसि यत् क्रुद्धः खड्गमद्भुतविक्रम ।
‘पार्थ! तुम क्यों इतने उतावले होकर विशाल खड्ग हाथमें ले रहे हो। अद्भुत पराक्रमी वीर! मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, इस समय तुम्हें यह क्या करनेकी इच्छा हुई है, जिससे कुपित होकर तलवार उठा रहे हो?’ ॥ ७ १/२ ॥
एवमुक्तस्तु कृष्णेन प्रेक्षमाणो युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥
अर्जुनः प्राह गोविन्दं क्रुद्धः सर्प इव श्वसन् ।
भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार पूछनेपर अर्जुनने क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए सर्पके समान युधिष्ठिरकी ओर देखकर श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ८ १/२ ॥
अन्यस्मै देहि गाण्डीवमिति मां योऽभिचोदयेत् ॥ ९ ॥
छिन्द्यामहं तस्य शिर इत्युपांशुव्रतं मम ।
तदुक्तं मम चानेन राज्ञामितपराक्रम ॥ १० ॥
समक्षं तव गोविन्द न तत् क्षन्तुमिहोत्सहे ।
तस्मादेनं वधिष्यामि राजानं धर्मभीरुकम् ॥ ११ ॥
‘जो मुझसे यह कह दे कि तुम अपना गाण्डीव धनुष दूसरेको दे दो, उसका मैं सिर काट लूँगा।’ मैंने मन-ही-मन यह प्रतिज्ञा कर रखी है। अनन्त पराक्रमी गोविन्द! आपके सामने ही इन महाराजने मुझसे वह बात कही है, अतः मैं इन्हें क्षमा नहीं कर सकता; इन धर्मभीरु नरेशका वध करूँगा ॥ ९—११ ॥
प्रतिज्ञां पालयिष्यामि हत्वैनं नरसत्तमम् ।
एतदर्थं मया खड्गो गृहीतो यदुनन्दन ॥ १२ ॥
‘यदुनन्दन! इन नरश्रेष्ठका वध करके मैं अपनी प्रतिज्ञाका पालन करूँगा; इसीलिये मैंने यह खड्ग हाथमें लिया है ॥ १२ ॥
सोऽहं युधिष्ठिरं हत्वा सत्यस्यानृण्यतां गतः ।
विशोको विज्वरश्चापि भविष्यामि जनार्दन ॥ १३ ॥
‘जनार्दन! मैं युधिष्ठिरका वध करके उस सच्ची प्रतिज्ञाके भारसे उऋण हो शोक और चिन्तासे मुक्त हो जाऊँगा ॥ १३ ॥
किं वा त्वं मन्यसे प्राप्तमस्मिन् काल उपस्थिते ।
त्वमस्य जगतस्तात वेत्थ सर्वं गतागतम् ॥ १४ ॥
तत् तथा प्रकरिष्यामि यथा मां वक्ष्यते भवान् ।
‘तात! आप इस अवसरपर क्या करना उचित समझते हैं? आप ही इस जगत्के भूत और भविष्यको जानते हैं, अतः आप मुझे जैसी आज्ञा देंगे, वैसा ही करूँगा’ ॥ १४ १/२ ॥