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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2124, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2124

इदं यदि द्वैतवनेऽप्यचक्षः
कर्णं योद्धुं न प्रशक्ये नृपेति ।
वयं ततः प्राप्तकालं च सर्वे
कृत्यान्युपैष्याम तथैव पार्थ ॥ ५ ॥
‘पार्थ! यदि तुमने द्वैतवनमें यह कह दिया होता कि ‘राजन्! मैं कर्णके साथ युद्ध नहीं कर सकूँगा' तो हम सब लोग समयोचित कर्तव्यका निश्चय करके उसीके अनुसार कार्य करते ॥ ५ ॥

मयि प्रतिश्रुत्य वधं हि तस्य
न वै कृतं तच्च तथैव वीर ।
आनीय नः शत्रुमध्यं स कस्मात्
समुत्क्षिप्य स्थण्डिले प्रत्यपिंषाः ॥ ६ ॥
‘वीर! तुमने मुझसे कर्णके वधकी प्रतिज्ञा करके उसका उसी रूपमें पालन नहीं किया। यदि ऐसा ही करना था तो हमें शत्रुओंके बीचमें लाकर पत्थरकी वेदीपर पटककर पीस क्यों डाला? ॥ ६ ॥

अप्याशिष्म वयमर्जुन त्वयि
यियासवो बहु कल्याणमिष्टम् ।
तन्नः सर्वं विफलं राजपुत्र
फलार्थिनां विफलं इवातिपुष्पः ॥ ७ ॥
‘राजकुमार अर्जुन! हमने बहुत-से मंगलमय अभीष्ट पदार्थ प्राप्त करनेकी इच्छा रखकर तुमपर आशा लगा रखी थी; परंतु फल चाहनेवाले मनुष्योंको अधिक फूलोंवाला फलहीन वृक्ष जैसे निराश कर देता है, उसी प्रकार तुमसे हमारी सारी आशा निष्फल हो गयी ॥ ७ ॥

प्रच्छादितं बडिशमिवामिषेण
संछादितं गरलमिवाशनेन ।
अनर्थकं मे दर्शितवानसि त्वं
राज्यार्थिनो राज्यरूपं विनाशम् ॥ ८ ॥
‘मैं राज्य पाना चाहता था; किंतु तुमने मांससे ढके हुए वंशीके काँटे और भोजनसामग्रीसे आच्छादित हुए विषके समान मुझे राज्यके रूपमें अनर्थकारी विनाशका ही दर्शन कराया है ॥ ८ ॥

त्रयोदशेमा हि समाः सदा वयं
त्वामन्वजीविष्म धनंजयाशया ।
काले वर्षं देवमिवोप्तबीजं
तन्नः सर्वान् नरके त्वं न्यमज्जः ॥ ९ ॥