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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2081, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2081

दुद्रुवुः शतशः संख्ये भीमसेनशराहताः ।
तदनन्तर भीमसेनके बाणोंसे आहत हो फूटे गण्डस्थल, विदीर्ण कुम्भस्थल और छिन्न-भिन्न शुण्डदण्डवाले सैकड़ों हाथी युद्धस्थलमें भागने लगे ।।
केचिद् वमन्तो रुधिरं भयार्ताः पर्वतोपमाः ।। ७१ ।।
व्यद्रवञ्छरविद्धाङ्गा धातुचित्रा इवाचलाः ।
भयसे पीड़ित हुए कितने ही पर्वताकार हाथी अपने सारे अंगोंमें बाणोंसे विद्ध होकर भयसे पीड़ित हो रक्त वमन करते हुए भागे जा रहे थे। उस समय विभिन्न धातुओंके कारण विचित्र दिखायी देनेवाले पर्वतोंके समान उनकी शोभा हो रही थी ।। ७१ ½ ।।
महाभुजंगसंकाशौ चन्दनागुरूरूषितौ ।। ७२ ।।
अपश्यं भीमसेनस्य धनुर्विक्षिप्तो भुजौ ।
धनुष खींचते हुए भीमसेनकी चन्दन और अगुरुसे चर्चित भुजाएँ मुझे दो बड़े सर्पोंके समान दिखायी देती थीं ।। ७२ ½ ।।
तस्य ज्यातलनिर्घोषं श्रुत्वाशनिसमस्वनम् ।। ७३ ।।
विमुञ्चन्तः शकृन्मूत्रं गजाः प्रादुद्रवुर्भृशम् ।
बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान उनकी प्रत्यंचाकी भयंकर टंकार सुनकर बहुत-से हाथी मल-मूत्र करते हुए बड़े जोरसे भाग रहे थे ।। ७३ ½ ।।
भीमसेनस्य तत् कर्म राजन्नेकस्य धीमतः ।
निघ्नतः सर्वभूतानि रुद्रस्येव च निर्बभौ ।। ७४ ।।
राजन्! अकेले बुद्धिमान् भीमसेनका वह कर्म समस्त प्राणियोंका संहार करते हुए रुद्रके समान जान पड़ता था ।। ७४ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकषष्टितमोऽध्यायः ।। ६१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६१ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३/२ श्लोक मिलाकर कुल ७४ ½ श्लोक हैं)