महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2064, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘कौरवो! तुम्हारा कल्याण हो। दौड़ो और वेगपूर्वक धावा करो। आज युद्धस्थलमें कोई
सृंजय तुम्हारे हाथसे जिस प्रकार भी जीवित न छूटने पावे, सावधान होकर वैसा ही प्रयत्न
करो। हम सब लोग तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे’ ।।
एवमुक्त्वा गतो ह्येष पृष्ठतो विकिरन् शरान् ।। ३९ ।।
पश्य कर्णं रणे पार्थ श्वेतच्छत्रविराजितम् ।
उदयं पर्वतं यद्वच्छशाङ्केनाभिशोभितम् ।। ४० ।।
‘ऐसा कहकर यह कर्ण पीछेसे बाण-वर्षा करता हुआ गया है। पार्थ! रणभूमिमें श्वेत
छत्रसे विराजमान कर्णको देखो। वह चन्द्रमासे सुशोभित उदयाचलके समान जान पड़ता
है ।। ३९-४० ।।
पूर्णचन्द्रनिकाशेन मूर्ध्निच्छत्रेण भारत ।
ध्रियमाणेण समरे श्रीमच्छतशलाकिना ।। ४१ ।।
एष त्वां प्रेक्षते कर्णः सकटाक्षं विशाम्पते ।
उत्तमं जवमास्थाय ध्रुवमेष्यति संयुगे ।। ४२ ।।
‘भारत! प्रजानाथ! समरांगणमें जिसके मस्तकपर सौ तेजस्वी शलाकाओंसे युक्त और
पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशमान श्वेत छत्र तना हुआ है, वही यह कर्ण तुम्हारी ओर
कटाक्षपूर्वक देख रहा है। निश्चय ही यह युद्धस्थलमें उत्तम वेगका आश्रय लेकर तुम्हारे
सामने आयेगा ।। ४१-४२ ।।
पश्य ह्येनं महाबाहो विधुन्वानं महत् धनुः ।
शरांश्चाशीविषाकारान् विसृजन्तं महारणे ।। ४३ ।।
‘महाबाहो! इसे देखो, यह अपना विशाल धनुष हिलाता हुआ महासमरमें विषधर
सर्पोंके समान विषैले बाणोंकी वृष्टि कर रहा है ।। ४३ ।।
असौ निवृत्तो राधेयो दृष्ट्वा ते वानरध्वजम् ।
प्रार्थयन् समरे पार्थ त्वया सह परंतप ।। ४४ ।।
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले कुन्तीकुमार! वह देखो, तुम्हारे वानरध्वजको देखकर
समरमें तुम्हारे साथ द्वैरथ युद्ध चाहता हुआ राधापुत्र कर्ण इधर लौट पड़ा है ।।
वधाय चात्मनोऽभ्येति दीप्तास्यं शलभो यथा ।
कर्णमेकाकिनं दृष्ट्वा रथानीकेन भारत ।। ४५ ।।
रिरक्षिषुः सुसंवृत्तो धार्तराष्ट्रो निवर्तते ।
‘जैसे पतंग प्रज्वलित आगके मुखमें आ पड़ता है, उसी प्रकार यह कर्ण अपने वधके
लिये ही तुम्हारे पास आ रहा है। भारत! कर्णको अकेला देख उसकी रक्षाके लिये
धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन भी रथसेनासे घिरा हुआ इधर ही लौट रहा है ।। ४५ १/२ ।।
सर्वैः सहैभिर्दुष्टात्मा वध्यतां च प्रयत्नतः ।। ४६ ।।
त्वया यशश्च राज्यं च सुखं चोत्तममिच्छता ।