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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2040, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2040

'समस्त सैनिकोंके सामने आपलोगोंके देखते-देखते जिन्होंने हथियार डाल दिया था, उन मेरे पिताको धृष्टद्युम्नने मार गिराया था ॥ ७ ॥
स तेनाहममर्षेण मित्रार्थे चापि पार्थिवाः ।
सत्यं वः प्रतिजानामि तद् वाक्यं मे निबोधत ॥ ८ ॥
'राजाओ! उससे होनेवाले अमर्षके कारण तथा मित्र दुर्योधनके कार्यकी सिद्धिके लिये मैं आपलोगोंसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, आपलोग मेरी यह बात सुनिये ॥ ८ ॥
धृष्टद्युम्नमहत्वांहं न विमोक्ष्यामि दंशनम् ।
अनृतायां प्रतिज्ञायां नाहं स्वर्गमवाप्नुयाम् ॥ ९ ॥
'मैं धृष्टद्युम्नको मारे बिना अपना कवच नहीं उतारूँगा।' यदि यह मेरी प्रतिज्ञा झूठी हो जाय तो मुझे स्वर्गलोककी प्राप्ति न हो ॥ ९ ॥
अर्जुनो भीमसेनश्च योधो यो रक्षिता रणे ।
धृष्टद्युम्नस्य तं संख्ये निहनिष्यामि सायकैः ॥ १० ॥
'अर्जुन और भीमसेन आदि जो योद्धा रणभूमिमें धृष्टद्युम्नकी रक्षा करेगा, उसे मैं युद्धस्थलमें अपने बाणोंद्वारा मार डालूँगा' ॥ १० ॥
एवमुक्ते ततः सर्वा सहिता भारतीचमूः ।
अभ्यद्रवत कौन्तेयांस्तथा ते चापि पाण्डवाः ॥ ११ ॥
अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर सारी कौरव-सेना एक साथ होकर कुन्तीपुत्रोंके सैनिकोंपर टूट पड़ी तथा पाण्डवोंने भी कौरवोंपर धावा बोल दिया ॥ ११ ॥
स संनिपातो रथयूथपानां
बभूव राजन्नतिभीमरूपः ।
जनक्षयः कालयुगान्तकल्पः
प्रावर्तताग्रे कुरुसृञ्जयानाम् ॥ १२ ॥
राजन्! रथयूथपतियोंका वह संघर्ष बड़ा भयंकर था। कौरवों और सृञ्जयोंके आगे प्रलयकालके समान जनसंहार आरम्भ हो गया था ॥ १२ ॥
ततः प्रवृत्ते युधि सम्प्रहारे
भूतानि सर्वाणि सदैवतानि ।
आसन् समेतानि सहाप्सरोभि-
र्दिदृक्षमाणानि नरप्रवीरान् ॥ १३ ॥
तदनन्तर युद्धस्थलमें जब भीषण मार-काट होने लगी, उस समय देवताओं तथा अप्सराओंसहित समस्त प्राणी उन नरवीरोंको देखनेकी इच्छासे एकत्र हो गये थे ॥ १३ ॥
दिव्यैश्च माल्यैर्विविधैश्च गन्धै-
र्दिव्यैश्च रत्नैर्विविधैर्नराग्र्यान् ।
रणे स्वकर्मोद्वहतः प्रवीरा-