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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2017, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2017

महाराज! उनके ऐसा कहनेपर द्रोणपुत्र मुसकराने-सा लगा। इनका कथन युक्तियुक्त तथा यथार्थ है, ऐसा सोचकर उसने कुछ उत्तर नहीं दिया ।। ३५ १/२ ।।

अनुक्त्वा च ततः किंचिच्छरवर्षेण पाण्डवम् ।। ३६ ।।
छादयामास समरे क्रुद्धोऽन्तक इव प्रजाः ।
उसने कोई जवाब न देकर समरांगणमें कुपित हो बाणोंकी वर्षासे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे प्रलयकालमें क्रुद्ध यमराज सारी प्रजाको अदृश्य कर देता है ।। ३६ १/२ ।।

स च्छाद्यमानस्तु तदा द्रोणपुत्रेण मारिष ।। ३७ ।।
पार्थोऽपयातः शीघ्रं वै विहाय महतीं चमूम् ।
आर्य! द्रोणपुत्रके बाणोंसे आच्छादित हो कुन्तीकुमार युधिष्ठिर उस समय अपनी विशाल सेनाको छोड़कर शीघ्र ही वहाँसे पलायन कर गये ।। ३७ १/२ ।।

अपयाते ततस्तस्मिन् धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे ।। ३८ ।।
द्रोणेपुत्रस्ततो राजन् प्रत्यगात् स महामनाः ।
राजन्! तत्पश्चात् धर्मपुत्र युधिष्ठिरके हट जानेपर फिर महामना द्रोणपुत्र अश्वत्थामा दूसरी ओर चला गया ।।

ततो युधिष्ठिरो राजंस्त्यक्त्वा द्रौणिं महाहवे ।
प्रययौ तावकं सैन्यं युक्तः क्रूराय कर्मणे ।। ३९ ।।
नरेश्वर! फिर उस महायुद्धमें अश्वत्थामाको छोड़कर युधिष्ठिर पुनः क्रूरतापूर्ण कर्म करनेके लिये आपकी सेनाकी ओर बढ़े ।। ३९ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि पार्थोपयाने पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरका पलायनविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५५ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं)