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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2003, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2003

तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं, उन अमेय आत्मबलसे सम्पन्न श्वेतवाहन अर्जुनने होशमें आकर बड़ी उतावलीके साथ ऐन्द्रास्त्रका प्रयोग किया ॥ ३८ १/२ ॥
ततो बाणसहस्राणि समुत्पन्नानि मारिष ॥ ३९ ॥
सर्वदिक्षु व्यदृश्यन्त निघ्नन्ति तव वाहिनीम् ।
मान्यवर! उससे सम्पूर्ण दिशाओंमें सहस्रों बाण प्रकट हो-होकर आपकी सेनाका संहार करते दिखायी दिये ॥
हयान् रथांश्च समरे शस्त्रैः शतसहस्रशः ॥ ४० ॥
वध्यमाने ततः सैन्ये भयं सुमहदाविशत् ।
संशप्तकगणानां च गोपालानां च भारत ॥ ४१ ॥
समरांगणमें शस्त्रोंद्वारा सैकड़ों और हजारों घोड़े तथा रथ मारे जाने लगे। भारत! इस प्रकार जब सेनाका संहार होने लगा, तब संशप्तकगणों और नारायणी सेनाके ग्वालोंको बड़ा भय हुआ ॥ ४०-४१ ॥
न हि तत्र पुमान् कश्चिद् योऽर्जुनं प्रत्यविध्यत ।
पश्यतां तत्र वीराणामहन्यत बलं तव ॥ ४२ ॥
उस समय वहाँ कोई भी ऐसा पुरुष नहीं था, जो अर्जुनपर चोट कर सके। वहाँ सब वीरोंके देखते-देखते आपकी सेनाका वध होने लगा ॥ ४२ ॥
हन्यमानमपश्यंश्च निश्चेष्टं स्म पराक्रमे ।
अयुतं तत्र योधानां हत्वा पाण्डुसुतो रणे ॥ ४३ ॥
व्यभ्राजत महाराज विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।
सारी सेना स्वयं निश्चेष्ट हो गयी थी। उससे पराक्रम करते नहीं बनता था और उस अवस्थामें वह मारी जा रही थी। मैंने यह सब अपनी आँखों देखा था। महाराज! पाण्डुपुत्र अर्जुन रणभूमिमें वहाँ दस हजार योद्धाओंका संहार करके धूमरहित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४३ १/२ ॥
चतुर्दश सहस्राणि यानि शिष्टानि भारत ॥ ४४ ॥
रथानामयुतं चैव त्रिसहस्राश्च दन्तिनः ।
भारत! उस समय संशप्तकोंके चौदह हजार पैदल, दस हजार रथ और तीन हजार हाथी शेष रह गये थे ॥ ४४ १/२ ॥
ततः संशप्तका भूयः परिवव्रुर्धनंजयम् ॥ ४५ ॥
मर्त्तव्यमिति निश्चित्य जयं वाप्यनिवर्त्तनम् ।
संशप्तकोंने पुनः यह निश्चय करके कि ‘मर जायँगे अथवा विजय प्राप्त करेंगे, किंतु युद्धसे पीछे नहीं हटेंगे’ अर्जुनको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ४५ १/२ ॥
तत्र युद्धं महच्चासीत् तावकानां विशाम्पते ।
शूरेण बलिना सार्धं पाण्डवेन किरीटिना ॥ ४६ ॥