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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2001, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2001

संचचाल महाराज वित्रस्ता चाद्रवद् भृशम् ॥ २३ ॥
महाराज! उस शंखनादको सुनकर संशप्तकोंकी सेना काँप उठी और भयभीत होकर जोर-जोरसे भागने लगी ॥ २३ ॥
पादबन्धं ततश्चक्रे पाण्डवः परवीरहा ।
नागमस्त्रं महाराज सम्प्रकीर्य मुहुर्मुहुः ॥ २४ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनने बारंबार नागास्त्रका प्रयोग करके उन सबके पैर बाँध लिये ॥ २४ ॥
ते बद्धाः पादबन्धेन पाण्डवेन महात्मना ।
निश्चेष्टाश्चाभवन् राजन्नश्मसारमया इव ॥ २५ ॥
राजन्! उन महात्मा पाण्डुपुत्र अर्जुनके द्वारा पैर बाँध दिये जानेके कारण वे संशप्तक योद्धा लोहेके बने हुए पुतलोंके समान निश्चेष्ट हो गये ॥ २५ ॥
निश्चेष्टांस्तु ततो योधानवधीत् पाण्डुनन्दनः ।
यथेन्द्रः समरे दैत्यांस्तारकस्य वधे पुरा ॥ २६ ॥
फिर पूर्वकालमें इन्द्रने तारकासुरके वधके समय समरांगणमें जिस प्रकार दैत्योंका वध किया था, उसी प्रकार पाण्डुनन्दन अर्जुनने निश्चेष्ट हुए संशप्तक योद्धाओंका संहार आरम्भ किया ॥ २६ ॥
ते वध्यमानाः समरे मुमुचुस्तं रथोत्तमम् ।
आयुधानि च सर्वाणि विस्रष्टुमुपचक्रमुः ॥ २७ ॥
समरांगणमें बाणोंकी मार पड़नेपर उन्होंने अर्जुनके उस उत्तम रथको छोड़ दिया और उनके ऊपर अपने समस्त अस्त्र-शस्त्रोंको छोड़नेका प्रयास किया ॥ २७ ॥
ते बद्धाः पादबन्धेन न शेकुश्चेष्टितुं नृप ।
ततस्तानवधीत् पार्थः शरैः संनतपर्वभिः ॥ २८ ॥
नरेश्वर! उस समय पैर बँधे होनेके कारण वे हिल भी न सके। तब अर्जुन झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उनका वध करने लगे ॥ २८ ॥
सर्वयोधा हि समरे भुजगैर्वेष्टिताभवन् ।
यानुद्दिश्य रणे पार्थः पादबन्धं चकार ह ॥ २९ ॥
रणभूमिमें कुन्तीकुमार अर्जुनने जिन-जिन योद्धाओंको लक्ष्य करके पादबन्धास्त्रका प्रयोग किया, वे समस्त योद्धा समरांगणमें नागोंद्वारा जकड़ लिये गये थे ॥ २९ ॥
ततः सुशर्मा राजेन्द्र गृहीतां वीक्ष्य वाहिनीम् ।
सौपर्णमस्त्रं त्वरितः प्रादुश्चक्रे महारथः ॥ ३० ॥
राजेन्द्र! महारथी सुशर्माने अपनी सेनाको नागोंद्वारा बँधी हुई देख तुरंत ही गारुडास्त्र प्रकट किया ॥ ३० ॥
ततः सुपर्णाः सम्पेतुर्भक्षयन्तो भुजङ्गमान् ।