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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1937, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1937

मैं युद्धमें अर्जुनके स्वरूपको ऐसा ही समझता हूँ। संग्रामभूमिमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं तथा असुरोंके द्वारा भी अर्जुन नहीं जीते जा सकते ॥ ७७ ॥
अथवा परितोषस्ते वाचोक्त्वा सुमना भव ।
न स शक्यो युधा जेतुमन्यं कुरु मनोरथम् ॥ ७८ ॥
अथवा यदि तुम्हें इसीसे संतोष होता है तो वाणीमात्रसे अर्जुनके वधकी चर्चा करके मन-ही-मन प्रसन्न हो लो। परंतु वास्तवमें युद्धके द्वारा कोई भी अर्जुनको जीत नहीं सकता। अतः अब तुम कोई और ही मनसूबा बाँधो ॥ ७८ ॥
बाहुभ्यामुद्धरेद् भूमिं दहेत् क्रुद्ध इमाः प्रजाः ।
पातयेत् त्रिदिवाद् देवान् योऽर्जुनं समरे जयेत् ॥ ७९ ॥
जो समरांगणमें अर्जुनको जीत ले, वह मानो अपनी दोनों भुजाओंसे पृथ्वीको उठा सकता है, कुपित होनेपर इस सारी प्रजाको दग्ध कर सकता है तथा देवताओंको भी स्वर्गसे नीचे गिरा सकता है ॥ ७९ ॥
पश्य कुन्तीसुतं वीरं भीममक्लिष्टकारिणम् ।
प्रभासन्तं महाबाहुं स्थितं मेरुमिवापरम् ॥ ८० ॥
लो देख लो, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भयंकर वीर महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुन दूसरे मेरुपर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हुए प्रकाशित हो रहे हैं ॥
अमर्षी नित्यसंरब्धश्चिरं वैरमनुस्मरन् ।
एष भीमो जयप्रेप्सुर्युधि तिष्ठति वीर्यवान् ॥ ८१ ॥
सदा क्रोधमें भरे रहकर दीर्घकालतक वैरको याद रखनेवाले ये अमर्षशील पराक्रमी भीमसेन विजयकी अभिलाषा लेकर युद्धके लिये खड़े हैं ॥ ८१ ॥
एष धर्मभृतां श्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
तिष्ठत्यसुकरः संख्ये परैः परपुरञ्जयः ॥ ८२ ॥
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले, ये धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर भी युद्धभूमिमें खड़े हैं। शत्रुओंके लिये इन्हें पराजित करना आसान नहीं है ॥ ८२ ॥
एतौ च पुरुषव्याघ्रावश्विनाविव सोदरौ ।
नकुलः सहदेवश्च तिष्ठतो युधि दुर्जयौ ॥ ८३ ॥
ये अश्विनीकुमारोंके समान सुन्दर दोनों भाई पुरुषप्रवर नकुल और सहदेव भी युद्धस्थलमें खड़े हैं। इन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन है ॥ ८३ ॥
अमी स्थिता द्रौपदेयाः पञ्च पञ्चाचला इव ।
व्यवस्थिता योद्धुकामाः सर्वेऽर्जुनसमा युधि ॥ ८४ ॥
ये द्रौपदीके पाँचों पुत्र पाँच पर्वतोंके समान अविचल भावसे युद्धके लिये खड़े हैं। रणभूमिमें ये सब-के-सब अर्जुनके समान पराक्रमी हैं ॥ ८४ ॥
एते द्रुपदपुत्राश्च धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व · पृष्ठ 1937, कुल 3237 में से · SarvaKosh