महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 191, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रोणचापविमुक्तेन शरौघेनाशुहारिणा ।
सिन्धोरिव महौघेन ह्रियमाणान् यथा प्लवान् ॥ ८ ॥
कौरवाः सिंहनादेन नानावाद्यस्वनेन च ।
रथद्विपनरांश्चैव सर्वतः समवारयन् ॥ ९ ॥
**संजयने कहा—**महाराज! कौरवोंने देखा कि पांचाल, पाण्डव, मत्स्य, सृंजय, चेदि और केकय-देशीय योद्धा युद्धमें द्रोणाचार्यके बाणोंसे पीड़ित हो विचलित हो उठे हैं तथा जैसे समुद्रकी महान् जलराशि बहुत-से नावोंको बहा ले जाती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटकर शीघ्र ही प्राण हर लेनेवाले बाण-समुदायने पाण्डव-सैनिकोंको मार भगाया है। तब वे सिंहनाद एवं नाना प्रकारके रण-वाद्योंका गम्भीर घोष करते हुए शत्रुओंके रथानारोहियों, हाथीसवारों तथा पैदल सैनिकोंको सब ओरसे रोकने लगे ॥ ७—९ ॥
तान् पश्यन् सैन्यमध्यस्थो राजा स्वजनसंवृतः ।
दुर्योधनोऽब्रवीत् कर्णं प्रहृष्टः प्रहसन्निव ॥ १० ॥
सेनाके बीचमें खड़े हो स्वजनोंसे घिरे हुए राजा दुर्योधनने पाण्डव-सैनिकोंकी ओर देखते हुए अत्यन्त प्रसन्न होकर कर्णसे हँसते हुए-से कहा ॥ १० ॥
दुर्योधन उवाच
पश्य राधेय पञ्चालान् प्रणुन्नान् द्रोणसायकैः ।
सिंहेनेव मृगान् वन्यांस्त्रासितान् दृढधन्वना ॥ ११ ॥
**दुर्योधन बोला—**राधानन्दन! देखो, सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले द्रोणाचार्यके बाणोंसे ये पांचाल सैनिक उसी प्रकार पीड़ित हो रहे हैं, जैसे सिंह वनवासी मृगोंको त्रस्त कर देता है ॥ ११ ॥
नैते जातु पुनर्युद्धमीहेयुरिति मे मतिः ।
यथा तु भग्ना द्रोणेन वातेनेव महाद्रुमाः ॥ १२ ॥
मेरा तो ऐसा विश्वास है कि ये फिर कभी युद्धकी इच्छा नहीं करेंगे। जैसे वायु बड़े-बड़े वृक्षोंको उखाड़ देती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यने युद्धसे इनके पाँव उखाड़ दिये हैं ॥ १२ ॥
अर्द्यमानाः शरैरेते रुक्मपुङ्खैर्महात्मना ।
पथा नैकेन गच्छन्ति घूर्णमानास्ततस्ततः ॥ १३ ॥
महामना द्रोणके सुवर्णमय पंखयुक्त बाणोंद्वारा पीड़ित होकर ये इधर-उधर चक्कर काटते हुए एक ही मार्गसे नहीं भाग रहे हैं ॥ १३ ॥
संनिरुद्धाश्च कौरव्यैर्द्रोणेन च महात्मना ।
एतेऽन्ये मण्डलीभूताः पावकेनेव कुञ्जराः ॥ १४ ॥
कौरव-सैनिकों तथा महामना द्रोणने इनकी गति रोक दी है। जैसे दावानलसे हाथी घिर जाते हैं, उसी प्रकार ये तथा अन्य पाण्डव-योद्धा कौरवोंसे घिर गये हैं ॥ १४ ॥