महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1868, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकार्याकार्यं न जानीषे कालपक्वोऽस्यसंशयम् ।
बह्वबद्धमकणीयं को हि ब्रूयाज्जिजीविषुः ॥ ७ ॥
तुम्हें कर्तव्य और अकर्तव्यका कुछ भी ज्ञान नहीं है। निःसंदेह तुम्हें कालने पका दिया
है। (अतः तुम पके हुए फलके समान गिरनेवाले ही हो); अन्यथा जो जीवित रहना चाहता
है, ऐसा कौन पुरुष ऐसी बहुत-सी न सुननेयोग्य ऊटपटांग बातें कह सकता है? ॥ ७ ॥
समुद्रतरणं दोर्भ्यां कण्ठे बद्ध्वा यथा शिलाम् ।
गिर्यग्राद् वा निपतनं तादृक् तव चिकीर्षितम् ॥ ८ ॥
जैसे कोई गलेमें पत्थर बाँधकर दोनों हाथोंसे समुद्र पार करना चाहे अथवा पहाड़ की
चोटीसे पृथ्वीपर कूदनेकी इच्छा करे, ऐसी ही तुम्हारी सारी चेष्टा और अभिलाषा है ॥ ८ ॥
सहितः सर्वयोधैस्त्वं व्यूढानीकैः सुरक्षितः ।
धनंजयेन युध्यस्व श्रेयश्चेत् प्राप्तुमिच्छसि ॥ ९ ॥
यदि तुम कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो व्यूहरचनापूर्वक खड़े हुए समस्त
सैनिकोंके साथ सुरक्षित रहकर अर्जुनसे युद्ध करो ॥ ९ ॥
हितार्थं धार्तराष्ट्रस्य ब्रवीमि त्वां न हिंसया ।
श्रद्धत्स्वैवं मया प्रोक्तं यदि तेऽस्ति जिजीविषा ॥ १० ॥
दुर्योधनके हितके लिये ही मैं ऐसा कह रहा हूँ, हिंसाभावसे नहीं। यदि तुम्हें जीनेकी
इच्छा है तो मेरे इस कथनपर विश्वास करो ॥ १० ॥
कर्ण उवाच
स्वबाहुवीर्यमाश्रित्य प्रार्थयाम्यर्जुनं रणे ।
त्वं तु मित्रमुखः शत्रुर्मां भीषयितुमिच्छसि ॥ ११ ॥
**कर्ण बोला—**शल्य! मैं अपने बाहुबलका भरोसा करके रणक्षेत्रमें अर्जुनको पाना
चाहता हूँ; परंतु तुम तो मुँहसे मित्र बने हुए वास्तवमें शत्रु हो, जो मुझे यहाँ डराना चाहते
हो ॥ ११ ॥
न मामस्मादभिप्रायात् कश्चिदद्य निवर्तयेत् ।
अपीन्द्रो वज्रमुद्यम्य किमु मर्त्यः कथंचन ॥ १२ ॥
परंतु मुझे इस अभिप्रायसे आज कोई भी पीछे नहीं लौटा सकता। वज्र उठाये हुए इन्द्र
भी मुझे किसी तरह इस निश्चयसे डिगा नहीं सकते, फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या
है? ॥ १२ ॥
संजय उवाच
इति कर्णस्य वाक्यान्ते शल्यः प्राहोत्तरं वचः ।
चुकोपयिषुरत्यर्थं कर्णं मद्रेश्वरः पुनः ॥ १३ ॥