महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1856, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘जहाँ सत्यप्रतिज्ञ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े हैं, जहाँ भीमसेन, अर्जुन, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण, सात्यकि, सृंजय वीर तथा नकुल और सहदेव डटे हुए हैं, वहाँ मेरे सिवा दूसरा कौन उन वीरोंका वेग सह सकता है? ।। २२ ।।
तस्मात् क्षिप्रं मद्रपते प्रयाहि
रणे पञ्चालान् पाण्डवान् सृञ्जयांश्च ।
तान् वा हनिष्यामि समेत्य संख्ये
यास्यामि वा द्रोणपथा यमाय ।। २३ ।।
‘इसलिये मद्रराज! तुम शीघ्र ही रणभूमिमें पांचाल, पाण्डव तथा सृंजय वीरोंकी ओर रथ ले चलो। आज युद्धस्थलमें उन सबके साथ भिड़कर या तो उन्हें ही मार डालूँगा या स्वयं ही द्रोणाचार्यके मार्गसे यमलोक चला जाऊँगा ।। २३ ।।
न त्वेवाहं न गमिष्यामि मध्ये
तेषां शूराणामिति मां शल्य विद्धि ।
मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मेऽयं
त्यक्त्वा प्राणाननुयास्यामि द्रोणम् ।। २४ ।।
‘शल्य! मैं उन शूरवीरोंके बीचमें नहीं जाऊँगा, ऐसा मुझे न समझो; क्योंकि संग्रामसे पीछे हटनेपर मित्रद्रोह होगा और यह मित्रद्रोह मेरे लिये असह्य है। इसलिये मैं प्राणोंका परित्याग करके द्रोणाचार्यका ही अनुसरण करूँगा ।। २४ ।।
प्राज्ञस्य मूढस्य च जीवितान्ते
नास्ति प्रमोक्षोऽन्तकसत्कृतस्य ।
अतो विद्वन्नभियास्यामि पार्थान्
दिष्टं न शक्यं व्यतिवर्तितुं वै ।। २५ ।।
‘विद्वान् हो या मूर्ख, आयुकी समाप्ति होनेपर सभीका यमराजके द्वारा यथायोग्य सत्कार होता है। उससे किसीको छुटकारा नहीं मिलता। अतः विद्वन्! मैं कुन्तीके पुत्रोंपर अवश्य चढ़ाई करूँगा। निश्चय ही दैवके विधानको कोई पलट नहीं सकता ।। २५ ।।
कल्याणवृत्तः सततं हि राजा
वैचित्रवीर्यस्य सुतो ममासीत् ।
तस्यार्थसिद्ध्यर्थमहं त्यजामि
प्रियान् भोगान् दुस्त्यजं जीवितं च ।। २६ ।।
‘धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन सदा ही मेरे कल्याण-साधनमें तत्पर रहा है; अतः आज उसके मनोरथकी सिद्धिके लिये मैं अपने प्रिय भोगोंको और जिसे त्यागना अत्यन्त कठिन है, उस जीवनको भी त्याग दूँगा ।। २६ ।।
वैयाघ्रचर्माणमकूजनाक्षं
हैमत्रिकोषं रजतत्रिवेणुम् ।