महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1831, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहयानां च स्तना राजंस्तदाप्रभृति नाभवन् ।। १०६ ।।
पीडितानां बलवता रुद्रेणाद्भुतकर्मणा ।
राजन्! आपका कल्याण हो। तभीसे बैलोंके दो खुर हो गये और तभीसे अद्भुत कर्म करनेवाले बलवान् रुद्रके द्वारा पीड़ित हुए घोड़ोंके स्तन नहीं उगे ।। १०६ १/२ ।।
अथाधिज्यं धनुः कृत्वा शर्वः संधाय तं शरम् ।। १०७ ।।
युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तयत् ।
तदनन्तर भगवान् रुद्रने धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसके ऊपर पूर्वोक्त बाणको रखा और उसे पाशुपतास्त्रसे संयुक्त करके तीनों पुरोंके एकत्र होनेका चिन्तन किया ।। १०७ १/२ ।।
तस्मिन् स्थिते महाराज रुद्रे विधृतकार्मुके ।। १०८ ।।
पुराणि तानि कालेन जग्मुरेवैकतां तदा ।
महाराज! इस प्रकार जब रुद्रदेव धनुष चढ़ाकर खड़े हो गये, उसी समय कालकी प्रेरणासे वे तीनों पुर मिलकर एक हो गये ।। १०८ १/२ ।।
एकीभावं गते चैव त्रिपुरत्वमुपागते ।। १०९ ।।
बभूव तुमुलॊ हर्षो देवतानां महात्मनाम् ।
जब तीनों एक होकर त्रिपुर-भावको प्राप्त हुए, तब महामनस्वी देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ ।। १०९ १/२ ।।
ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ।। ११० ।।
जयेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तो महेश्वरम् ।
उस समय समस्त देवता, महर्षि और सिद्धगण महेश्वरकी स्तुति करते हुए उनकी जय-जयकार करने लगे ।। ११० १/२ ।।
ततोऽग्रतः प्रादुरभूत् त्रिपुरं निघ्नतोऽसुरान् ।। १११ ।।
अनिर्देश्योग्रवपुषो देवस्यासह्यतेजसः ।
तब असुरोंका संहार करते हुए अवर्णनीय भयंकर रूपवाले असह्य तेजस्वी महादेवजीके सामने वह तीनों पुरोंका समुदाय सहसा प्रकट हो गया ।। १११ १/२ ।।
स तद् विकृष्य भगवान् दिव्यं लोकेश्वरो धनुः ।। ११२ ।।
त्रैलोक्यसारं तमिषुं मुमोच त्रिपुरं प्रति ।
फिर तो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् रुद्रने अपने उस दिव्य धनुषको खींचकर उसपर रखे हुए त्रिलोकीके सारभूत उस बाणको त्रिपुरपर छोड़ दिया ।। ११२ १/२ ।।
उत्सृष्टे वै महाभाग तस्मिन्निषुवरे तदा ।। ११३ ।।
महानार्तस्वरो ह्यासीत् पुराणां पततां भुवि ।
तान् सोऽसुरगणान् दग्ध्वा प्राक्षिपत् पश्चिमार्णवे ।। ११४ ।।