महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1829, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुष्टमासीज्जगत् सर्वं देवताश्च नरोत्तम ॥ ९० ॥
नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंको अभय देनेवाले देवेश्वर महादेवजीके इस प्रकार प्रस्थान करनेपर सारा जगत् संतुष्ट हो गया। देवता भी बड़े प्रसन्न हुए ॥ ९० ॥
ऋषयस्तत्र देवेशं स्तुवन्तो बहुभिः स्तवैः ।
तेजश्चास्मै वर्धयन्तो राजन्नासन् पुनः पुनः ॥ ९१ ॥
राजन्! ऋषिगण नाना प्रकारके स्तोत्रोंका पाठ करके देवेश्वर महादेवकी स्तुति करते हुए बारंबार उनका तेज बढ़ा रहे थे ॥ ९१ ॥
गन्धर्वाणां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।
वादयन्ति प्रयाणेऽस्य वाद्यानि विविधानि च ॥ ९२ ॥
उनके प्रस्थानके समय सहस्रों, लाखों और अरबों गन्धर्व नाना प्रकारके बाजे बजा रहे थे ॥ ९२ ॥
ततोऽधिरूढे वरदे प्रयाते चासुरान् प्रति ।
साधु साध्विति विश्वेशः स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ ९३ ॥
रथपर आरूढ़ हो वरदायक भगवान् शंकर जब असुरोंकी ओर चले, तब वे विश्वनाथ ब्रह्माजीको साधुवाद देते हुए मुसकराकर बोले— ॥ ९३ ॥
याहि देव यतो दैत्याश्चोदयाश्वानतन्द्रितः ।
पश्य बाह्वोर्बलं मेऽद्य निघ्नतः शात्रवान् रणे ॥ ९४ ॥
'देव! जिस ओर दैत्य हैं, उधर ही चलिये और सावधान होकर घोड़ोंको हाँकिये। आज रणभूमिमें जब मैं शत्रुसेनाका संहार करने लगूँ, उस समय आप मेरी इन दोनों भुजाओंका बल देखियेगा' ॥ ९४ ॥
ततोऽश्वांश्चोदयामास मनोमारुतरंहसः ।
येन तत् त्रिपुरं राजन् दैत्यदानवरक्षितम् ॥ ९५ ॥
राजन्! तब ब्रह्माजीने मन और पवनके समान वेगशाली घोड़ोंको उसी ओर बढ़ाया, जिस ओर दैत्यों और दानवोंद्वारा सुरक्षित वे तीनों पुर थे ॥ ९५ ॥
पिबद्भिरिव चाकाशं तैर्हयैर्लोकपूजितैः ।
जगाम भगवान् क्षिप्रं जयाय त्रिदिवौकसाम् ॥ ९६ ॥
वे लोकपूजित अश्व ऐसे तीव्र वेगसे चल रहे थे, मानो सारे आकाशको पी जायँगे। उस समय भगवान् शिव उन अश्वोंके द्वारा देवताओंकी विजयके लिये बड़ी शीघ्रताके साथ जा रहे थे ॥ ९६ ॥
प्रयाते रथमास्थाय त्रिपुराभिमुखे भवे ।
ननाद सुमहानादं वृषभः पूरयन् दिशः ॥ ९७ ॥
रथपर आरूढ़ हो जब महादेवजी त्रिपुरकी ओर प्रस्थित हुए, उस समय नन्दी वृषभने सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ९७ ॥