सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1753, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1753

‘जैसे कोई शक्तिशाली पुरुष समुद्रसे नदीके वेगको पीछे लौटा दे, उसी प्रकार मैं आपके इस रथको तुरंत लौटा ले चलूँगा। मेरी समझमें ये ब्राह्मण देवता अवध्य हैं, जिनसे आज आपका पराक्रम प्रतिहत हो गया’ ।। १४ १/२ ।।
धृष्टद्युम्नस्ततो राजन् शनैर्ह्यब्रवीद् वचः ।। १५ ।।
मुह्यते मे मनस्तात गात्रस्वेदश्च जायते ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च सारथे ।। १६ ।।
राजन्! यह सुनकर धृष्टद्युम्नने धीरेसे कहा—‘सारथे! मेरे मनपर मोह छा रहा है और शरीरसे पसीना छूटने लगा है। मेरे सारे अंग काँप रहे हैं और रोमांच हो आया है ।। १५-१६ ।।
वर्जयन् ब्राह्मणं युद्धे शनैर्याहि यतोऽर्जुनः ।
अर्जुनं भीमसेनं वा समरे प्राप्य सारथे ।। १७ ।।
क्षेममद्य भवेदेवमेषा मे नैष्ठिकी मतिः ।
‘तुम युद्धस्थलमें ब्राह्मण कृपाचार्यको छोड़ते हुए धीरे-धीरे जहाँ अर्जुन हैं, उसी ओर चल दो। समरांगणमें अर्जुन अथवा भीमसेनके पास पहुँचकर ही आज मैं सकुशल रह सकता हूँ, ऐसा मेरा दृढ़ विचार है’ ।। १७ १/२ ।।
ततः प्रायान्महाराज सारथिस्त्वरयन् हयान् ।। १८ ।।
यतो भीमो महेष्वासो युयुधे तव सैनिकैः ।
महाराज! तब सारथि घोड़ोंको तेजीसे हाँकता हुआ उसी ओर चल दिया जहाँ महाधनुर्धर भीमसेन आपके सैनिकोंके साथ युद्ध कर रहे थे ।। १८ १/२ ।।
प्रद्रुतं च रथं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नस्य मारिष ।। १९ ।।
किरन् शतशतान्येव गौतमोऽनुययौ तदा ।
मान्यवर नरेश! धृष्टद्युम्नके रथको वहाँसे भागते देख कृपाचार्यने सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करते हुए उनका पीछा किया ।। १९ १/२ ।।
शङ्खं च पूरयामास मुहुर्मुहुररिंदमः ।। २० ।।
पार्षतं त्रासयामास महेन्द्रो नमुचिं यथा ।
शत्रुओंका दमन करनेवाले कृपाचार्यने बारंबार शंखध्वनि की और जैसे इन्द्रने नमुचिको डराया था, उसी प्रकार उन्होंने धृष्टद्युम्नको भयभीत कर दिया ।। २० १/२ ।।
शिखण्डिनं तु समरे भीष्ममृत्युं दुरासदम् ।। २१ ।।
हार्दिक्यो वारयामास स्मयन्निव मुहुर्मुहुः ।
दूसरी ओर समरांगणमें दुर्जय वीर शिखण्डीको, जो भीष्मके लिये मृत्युस्वरूप था, कृतवर्माने बारंबार मुसकराते हुए-से रोका ।। २१ १/२ ।।
शिखण्डी तु समासाद्य हृदिकानां महारथम् ।। २२ ।।