महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1749, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभ्राम्यमाणं ततस्तं तु विमलाम्बरवर्चसम् ।
कालदण्डोपमं मेने सुतसोमस्य धीमतः ॥ ३० ॥
बुद्धिमान् सुतसोमके उस निर्मल आकाशके समान कान्तिवाले खड्गको घुमाया जाता देख शकुनिने उसे अपने लिये कालदण्डके समान माना ॥ ३० ॥
सोऽचरत् सहसा खड्गी मण्डलानि समन्ततः ।
चतुर्दश महाराज शिक्षाबलसमन्वितः ॥ ३१ ॥
महाराज! सुतसोम शिक्षा और बल दोनोंसे सम्पन्न था, वह खड्ग लेकर सहसा उसके चौदह मण्डल (पैंतरे) दिखाता हुआ रणभूमिमें सब ओर विचरने लगा ॥ ३१ ॥
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं सृतम् ।
सम्पातसमुदीर्णे च दर्शयामास संयुगे ॥ ३२ ॥
उसने युद्धस्थलमें भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, प्लुत, सृत, सम्पात और समुदीर्ण आदि गतियोंको दिखाया ॥ ३२ ॥
सौबलस्तु ततस्तस्य शरांश्चिक्षेप वीर्यवान् ।
तानापतत एवाशु चिच्छेद परमासिना ॥ ३३ ॥
तब पराक्रमी सुबलपुत्रने सुतसोमपर बहुत-से बाण चलाये; परंतु उसने अपने उत्तम खड्गसे निकट आते ही उन सब बाणोंको काट गिराया ॥ ३३ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज सौबलः परवीरहा ।
प्राहिणोत् सुतसोमाय शरानाशीविषोपमान् ॥ ३४ ॥
महाराज! इससे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुबलपुत्र शकुनिको बड़ा क्रोध हुआ। उसने सुतसोमपर विषधर सर्पोंके समान बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३४ ॥
चिच्छेद तांस्तु खड्गेन शिक्षया च बलेन च ।
दर्शयँल्लाघवं युद्धे तार्क्ष्यतुल्यपराक्रमः ॥ ३५ ॥
परंतु गरुड़के तुल्य पराक्रमी सुतसोमने अपनी शिक्षा और बलके अनुसार युद्धमें फुर्ती दिखाते हुए खड्गसे उन सब बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ३५ ॥
तस्य संचरतो राजन् मण्डलावर्तने तदा ।
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन खड्गं चिच्छेद सुप्रभम् ॥ ३६ ॥
राजन्! सुतसोम जब अपनी चमकीली तलवारको मण्डलाकार घुमा रहा था, उसी समय शकुनिने तीखे क्षुरप्रसे उसके दो टुकड़े कर दिये ॥ ३६ ॥
स छिन्नः सहसा भूमौ निपपात महानसिः ।
अर्धमस्य स्थितं हस्ते सुत्सारोस्तत्र भारत ॥ ३७ ॥
वह महान् खड्ग कटकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। भारत! सुन्दर मूठवाले उस खड्गका आधा भाग सुतसोमके हाथमें ही रह गया ॥ ३७ ॥
छिन्नमाज्ञाय निस्त्रिंशमवप्लुत्य पदानि षट् ।