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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1718, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1718

समाप्तविद्यं तु गुरोः सुतं नृपः
समाप्तकर्माणमुपेत्य ते सुतः ।
सुहृद्वृतोऽत्यर्थमपूजयन्मुदा
जिते बलौ विष्णुमिवामरेश्वरः ॥ ५१ ॥

जिसने पूरी विद्या समाप्त कर ली है तथा समस्त कर्तव्यकर्म पूर्ण कर लिये हैं, उस गुरुपुत्र अश्वत्थामाके पास सुहृदोंसहित आकर आपके पुत्र दुर्योधनने प्रसन्नतापूर्वक उसकी बड़ी पूजा की। ठीक उसी तरह जैसे बलिके पराजित होनेपर देवराज इन्द्रने विष्णुका पूजन किया था ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि पाण्ड्यवधे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें पाण्ड्यवधविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥


* बाणोंकी दस गतियाँ बतायी गयी हैं, जो इस प्रकार हैं—१-उन्मुखी, २-अभिमुखी, ३-तिर्यक्, ४-मन्दा, ५-गोमूत्रिका, ६-ध्रुवा, ७-स्खलिता, ८-यमकाक्रान्ता, ९-कृष्टा और १०-अतिकृष्टा। इनमेंसे पूर्वकी तीन गतियाँ क्रमशः मस्तक, हृदय तथा पार्श्वदेशका स्पर्श करनेवाली हैं। अर्थात् उन्मुखी गतिसे छोड़ा हुआ बाण मस्तकपर, अभिमुखी गतिसे प्रेरित बाण वक्षःस्थलपर और तिर्यक्-गतिसे चलाया हुआ बाण पार्श्वभागमें आघात करता है। मन्दा गतिसे छोड़े गये बाण त्वचाको कुछ-कुछ छेद पाते हैं। गोमूत्रिका गतिसे चलाये गये बाण बायें और दायें दोनों ओर जाते तथा कवचको भी काट देते हैं। ध्रुवा गति निश्चितरूपसे लक्ष्यका भेदन करानेवाली होती है। स्खलिता कहते हैं, लक्ष्यसे विचलित होनेवाली गतिको। उसके द्वारा संचालित बाण लक्ष्यभ्रष्ट होते हैं। यमकाक्रान्ता वह गति है, जिसके द्वारा प्रेरित बाण बारंबार लक्ष्य वेधकर निकल जाते हैं। कृष्टा उस गतिका नाम है, जो लक्ष्यके एक अवयव भुजा आदिका छेदन करती है। दसवीं गतिका नाम है अतिकृष्टा; जिसके द्वारा चलाया गया बाण शत्रु‌का मस्तक काटकर उसके साथ ही दूर जा गिरता है। (नीलकण्ठीके आधारपर)