सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1509, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1509

‘धर्मका चोला पहने हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने युद्धपरायण आचार्यसे ‘शस्त्र त्याग दीजिये’ ऐसा कहा था और शस्त्र रखवा दिया; इसलिये मैं उसके देखते-देखते उनकी सारी सेनाको खदेड़ दूँगा और समस्त सैनिकोंको भगाकर उस नीच पांचालपुत्रको मार डालूँगा।।

सर्वनेतान् हनिष्यामि यदि योत्स्यन्ति मां रणे ।
सत्यं ते प्रतिजानामि परिवर्तय वाहिनीम् ॥ ७ ॥
‘यदि ये रणभूमिमें मेरे साथ युद्ध करेंगे तो मैं इन सबका वध कर डालूँगा, यह मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ। अतः तुम अपनी सेनाको लौटाओ’ ॥ ७ ॥

तच्छ्रुत्वा तव पुत्रस्तु वाहिनीं पर्यवर्तयत् ।
सिंहनादेन महता व्यपोह्य सुमहद् भयम् ॥ ८ ॥
यह सुनकर आपके पुत्रने महान् सिंहनादके द्वारा अपनी सेनाका भारी भय दूर करके फिर उसे लौटाया ॥ ८ ॥

ततः समागमो राजन् कुरुपाण्डवसेनयोः ।
पुनरेवाभवत् तीव्रः पूर्णसागरयोरिव ॥ ९ ॥
राजन्! फिर भरे हुए दो महासागरोंके समान कौरव-पाण्डव-सेनाओंमें घोर संग्राम आरम्भ हो गया ॥ ९ ॥

संरब्धा हि स्थिरीभूता द्रोणपुत्रेण कौरवाः ।
उदग्राः पाण्डुपाञ्चाला द्रोणस्य निधनेन च ॥ १० ॥
द्रोणपुत्रसे आश्वासन पाकर कौरव-सैनिक स्थिर हो युद्धके लिये रोष और उत्साहमें भर गये थे। उधर द्रोणाचार्यके मारे जानेसे पाण्डव और पांचाल वीर पहलेसे ही उद्धत हो रहे थे ॥ १० ॥

तेषां परमहृष्टानां जयमात्मनि पश्यताम् ।
संरब्धानां महावेगः प्रादुरासीद् विशाम्पते ॥ ११ ॥
प्रजानाथ! वे अत्यन्त हर्षोत्फुल्ल होकर अपनी ही विजय देख रहे थे। रोषावेशमें भरे हुए उन सैनिकोंका महान् वेग प्रकट हुआ ॥ ११ ॥

यथा शिलोच्चये शैलः सागरे सागरो यथा ।
प्रतिहन्येत राजेन्द्र तथाऽऽसन् कुरुपाण्डवाः ॥ १२ ॥
राजेन्द्र! जैसे एक पहाड़ दूसरे पहाड़से टकरा जाय तथा एक समुद्र दूसरे समुद्रसे टक्कर ले, वही अवस्था कौरव-पाण्डव योद्धाओंकी भी थी ॥ १२ ॥

ततः शङ्खसहस्राणि भेरीणामयुतानि च ।
अवादयन्त संहृष्टाः कुरुपाण्डवसैनिकाः ॥ १३ ॥
तदनन्तर हर्षमग्न हुए कौरव-पाण्डव-सैनिक सहस्रों शंख और हजारों रणभेरियाँ बजाने लगे ॥ १३ ॥

यथा निर्मथ्यमानस्य सागरस्य तु निःस्वनः ।