सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1496, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1496

लिये तुम मेरी प्रशंसा क्यों नहीं करते? ॥ ३५ ॥
योऽसौ ममैव नान्यस्य बान्धवान् युधि जघ्निवान् ।
छित्त्वापि तस्य मूर्धानं नैवास्मि विगतज्वरः ॥ ३६ ॥
जिसने युद्धके मैदानमें दूसरे किसीके नहीं, मेरे ही बन्धु-बान्धवोंका वध किया था, उसका मस्तक काट लेनेपर भी मेरा क्रोध और संताप शान्त नहीं हुआ ॥ ३६ ॥
तच्च मे कृन्तते मर्म यन्न तस्य शिरो मया ।
निषादविषये क्षिप्तं जयद्रथशिरो यथा ॥ ३७ ॥
जैसे तुमने जयद्रथके मस्तकको दूर फेंका था, उसी प्रकार मैंने द्रोणाचार्यके मस्तकको जो निषादोंके स्थानमें नहीं फेंक दिया, वह भूल मेरे मर्मस्थानोंका छेदन कर रही है ॥
अथावधश्च शत्रूणामधर्मः श्रूयतेऽर्जुन ।
क्षत्रियस्य हि धर्मोऽयं हन्याद्धन्येत वा पुनः ॥ ३८ ॥
अर्जुन! सुननेमें आया है कि शत्रुओंका वध न करना भी अधर्म ही है। क्षत्रियके लिये तो यह धर्म ही है कि वह युद्धमें शत्रुको मार डाले या फिर स्वयं उसके हाथसे मारा जाय ॥ ३८ ॥
स शत्रुर्निहतः संख्ये मया धर्मेण पाण्डव ।
यथा त्वया हतः शूरो भगदत्तः पितुः सखा ॥ ३९ ॥
पाण्डुनन्दन! द्रोणाचार्य मेरे शत्रु थे, अतः मैंने युद्धमें धर्मके अनुसार ही उनका वध किया है। ठीक उसी तरह, जैसे तुमने अपने पिताके प्रिय मित्र शूरवीर भगदत्तका वध किया था ॥ ३९ ॥
पितामहं रणे हत्वा मन्यसे धर्ममात्मनः ।
मया शत्रौ हते कस्मात् पापे धर्मं न मन्यसे ॥ ४० ॥
तुम युद्धमें पितामहको मारकर भी अपने लिये तो धर्म ही मानते हो, किंतु मेरे द्वारा एक पापी शत्रुके मारे जानेपर भी इस कार्यको धर्म नहीं समझते; इसका क्या कारण है? ॥
सम्बन्धावनतं पार्थ न मां त्वं वक्तुमर्हसि ।
स्वगात्रकृतसोपानं निष्षण्णमिव दन्तिनम् ॥ ४१ ॥
पार्थ! जैसे हाथी सम्बन्ध स्थापित कर लेनेपर लोगोंको अपने ऊपर चढ़ानेके लिये अपने ही शरीरकी सीढ़ी बनाकर बैठ जाता है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे साथ सम्बन्ध होनेके कारण नतमस्तक होता हूँ; अतः तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिये ॥ ४१ ॥
क्षमामि ते सर्वमेव वाग्व्यतिक्रममर्जुन ।
द्रौपद्या द्रौपदेयानां कृते नान्येन हेतुना ॥ ४२ ॥
अर्जुन! मैं अपनी बहिन द्रौपदी और उसके पुत्रोंके नाते ही तुम्हारी इन सारी उलटी या कड़वी बातोंको सहे लेता हूँ, दूसरे किसी कारणसे नहीं ॥ ४२ ॥