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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1452, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1452

फिर क्रोधमें भरकर बाण चलाते हुए उन्होंने रणभूमिमें कठिनतासे रोके जानेवाले द्रोणाचार्यको रोक देनेकी इच्छासे उन्हें बाणोंकी वर्षाद्वारा ढक दिया ॥ ३० ॥
तौ न्यवारयतां श्रेष्ठौ संरब्धौ रणशोभिनौ ।
उदीरयेतां ब्रह्माणि दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ॥ ३१ ॥
संग्रामभूमिमें शोभा पानेवाले वे दोनों श्रेष्ठ वीर कुपित हो नाना प्रकारके दिव्यास्त्र एवं ब्रह्मास्त्र प्रकट करते हुए एक-दूसरेको आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ ३१ ॥
स महास्त्रैर्महाराज द्रोणमाच्छादयद् रणे ।
निहत्य सर्वाण्यस्त्राणि भारद्वाजस्य पार्षतः ॥ ३२ ॥
महाराज! धृष्टद्युम्नने रणभूमिमें द्रोणाचार्यके सभी अस्त्रोंको नष्ट करके उन्हें अपने महान् अस्त्रोंद्वारा आच्छादित कर दिया ॥ ३२ ॥
सवसातीञ्शिबींश्चैव बाह्लीकान् कौरवानपि ।
रक्षिष्यमाणान् संग्रामे द्रोणं व्यधमदच्युतः ॥ ३३ ॥
कभी विचलित न होनेवाले पांचालवीरने संग्राममें द्रोणाचार्यकी रक्षा करनेवाले बसाति, शिबि, बाह्लीक और कौरवयोध्दाओंका भी संहार कर डाला ॥ ३३ ॥
धृष्टद्युम्नस्तथा राजन् गभस्तिभिरिवांशुमान् ।
बभौ प्रच्छादयन्नाशाः शरजालैः समन्ततः ॥ ३४ ॥
राजन्! अपने बाणोंके समूहसे सम्पूर्ण दिशाओंको सब ओरसे आच्छादित करते हुए धृष्टद्युम्न किरणोंद्वारा अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३४ ॥
तस्य द्रोणो धनुश्छित्त्वा विद्ध्वा चैनं शिलीमुखैः ।
मर्माण्यभ्यहनद् भूयः स व्यथां परमामगात् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नका धनुष काटकर उन्हें बाणोंद्वारा घायल कर दिया और पुनः उनके मर्मस्थानोंको गहरी चोट पहुँचायी; इससे उन्हें बड़ी व्यथा हुई ॥ ३५ ॥
ततो भीमो दृढक्रोधो द्रोणस्याश्लिष्य तं रथम् ।
शनकैरिव राजेन्द्र द्रोणं वचनमब्रवीत् ॥ ३६ ॥
राजेन्द्र! तब अपने क्रोधको दृढ़तापूर्वक बनाये रखनेवाले भीमसेन द्रोणाचार्यके उस रथसे सटकर उनसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोले— ॥ ३६ ॥
यदि नाम न युध्येरन् शिक्षिता ब्रह्मबान्धवाः ।
स्वकर्मभिरसंतुष्टा न स्म क्षत्रं क्षयं व्रजेत् ॥ ३७ ॥
‘यदि शिक्षित ब्राह्मण अपने कर्मोंसे असंतुष्ट हो परधर्मका आश्रय ले युद्ध न करते तो क्षत्रियोंका यह संहार न होता ॥ ३७ ॥
अहिंसां सर्वभूतेषु धर्मं ज्यायस्तरं विदुः ।
तस्य च ब्राह्मणो मूलं भवांश्च ब्रह्मवित्तमः ॥ ३८ ॥