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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1433, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1433

ततो व्यरोचत द्रोणो विनिघ्नन् सर्वसैनिकान् ।। २५ ।।
शिरांस्यपातयच्चापि पञ्चालानां महामृधे ।
तथैव परिघाकारान् बाहून् कनकभूषणान् ।। २६ ।।
तदनन्तर सम्पूर्ण सैनिकोंका विनाश करते हुए द्रोणाचार्यकी बड़ी शोभा होने लगी। उन्होंने उस महासमरमें पांचालवीरोंके मस्तक और सुवर्णभूषित परिघ-जैसी मोटी भुजाएँ काट गिरायीं ।। २५-२६ ।।

ते वध्यमानाः समरे भारद्वाजेन पार्थिवाः ।
मेदिन्यामन्वकीर्यन्त वातनुन्ना इव द्रुमाः ।। २७ ।।
समरांगणमें द्रोणाचार्यके द्वारा मारे जानेवाले वे पांचालनरेश आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंके समान धरतीपर बिछ गये ।। २७ ।।

कुञ्जराणां च पततां ह्यौघानां च भारत ।
अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ।। २८ ।।
भरतनन्दन! धराशायी होते हुए हाथियों और अश्वसमूहोंके मांस तथा रक्तसे कीच जम जानेके कारण वहाँकी भूमिपर चलना-फिरना असम्भव हो गया ।। २८ ।।

हत्वा विंशतिसाहस्रान् पञ्चालानां रथव्रजान् ।
अतिष्ठदाहवे द्रोणो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।। २९ ।।
उस समय पांचालोंके बीस हजार रथियोंका संहार करके द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान खड़े थे ।। २९ ।।

तथैव च पुनः क्रुद्धो भारद्वाजः प्रतापवान् ।
वसुदानस्य भल्लेन शिरः कायादपाहरत् ।। ३० ।।
प्रतापी भरद्वाजनन्दनने पुनः पूर्ववत् कुपित होकर एक भल्लके द्वारा वसुदानका मस्तक धड़से अलग कर दिया ।।

पुनः पञ्चशतान् मत्स्यान् षट्सहस्रांश्च सृञ्जयान् ।
हस्तिनामयुतं हत्वा जघानाश्वायुतं पुनः ।। ३१ ।।
इसके बाद मत्स्यदेशके पचास योद्धाओंका, सृंजयवंशके छः हजार सैनिकोंका तथा दस हजार हाथियोंका संहार करके उन्होंने पुनः दस हजार घुड़सवारोंकी सेनाका सफाया कर दिया ।। ३१ ।।

क्षत्रियाणामभावाय दृष्ट्वा द्रोणमवस्थितम् ।
ऋषयोऽभ्यागतास्तूर्णं हव्यवाहपुरोगमाः ।। ३२ ।।
इस प्रकार द्रोणाचार्यको क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये उद्यत देख तुरंत ही अग्निदेवको आगे करके बहुत-से महर्षि वहाँ आये ।। ३२ ।।

विश्वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतमः ।
वसिष्ठः कश्यपोऽत्रिश्च ब्रह्मलोकं निनीषवः ।। ३३ ।।