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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1415, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1415

द्रोणाचार्यके धनुषसे क्रमशः छूटे हुए ऐन्द्र, पाशुपत, त्वाष्ट्र, वायव्य तथा वारुण नामक अस्त्रको अर्जुनने तत्काल शान्त कर दिया ॥ ३१ १/२ ॥
अस्त्राण्यस्त्रैर्यदा तस्य विधिवद्धन्ति पाण्डवः ॥ ३२ ॥
ततोऽस्त्रैः परमैर्दिव्यैर्द्रोणः पार्थमवाकिरत् ।
जब पाण्डुकुमार अर्जुन आचार्यके सभी अस्त्रोंको अपने अस्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक नष्ट करने लगे, तब द्रोणने परम दिव्य अस्त्रोंद्वारा अर्जुनको ढक दिया ॥ ३२ १/२ ॥
यद् यदस्त्रं स पार्थाय प्रयुङ्क्ते विजिगीषया ॥ ३३ ॥
तस्य तस्य विघाताय तत् तद्धि कुरुतेऽर्जुनः ।
परंतु विजयकी इच्छासे वे पार्थपर जिस-जिस अस्त्रका प्रयोग करते थे, उस-उसके विनाशके लिये अर्जुन वैसे ही अस्त्रोंका प्रयोग करते थे ॥ ३३ १/२ ॥
स वध्यमानेष्वस्त्रेषु दिव्येष्वपि यथाविधि ॥ ३४ ॥
अर्जुनेनार्जुनं द्रोणो मनसैवाभ्यपूजयत् ।
जब अर्जुनके द्वारा उनके विधिपूर्वक चलाये हुए दिव्यास्त्र भी प्रतिहत होने लगे, तब द्रोणने अर्जुनकी मन-ही-मन सराहना की ॥ ३४ १/२ ॥
मेने चात्मानमधिकं पृथिव्यामधि भारत ॥ ३५ ॥
तेन शिष्येण सर्वेभ्यः शस्त्रविद्भ्यः परंतपः ।
भारत! शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य उस शिष्यके द्वारा अपने-आपको भूमण्डलके सभी शस्त्रवेत्ताओंसे श्रेष्ठ मानने लगे ॥ ३५ १/२ ॥
वार्यमाणस्तु पार्थेन तथा मध्ये महात्मनाम् ॥ ३६ ॥
यतमानोऽर्जुनं प्रीत्या प्रत्यवारयदत्स्मयन् ।
महामनस्वी वीरोंके बीचमें अर्जुनके द्वारा इस प्रकार रोके जाते हुए द्रोणाचार्य प्रयत्न करके प्रसन्नतापूर्वक मुसकराते हुए स्वयं भी अर्जुनको आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ ३६ १/२ ॥
ततोऽन्तरिक्षे देवाश्च गन्धर्वाश्च सहस्रशः ॥ ३७ ॥
ऋषयः सिद्धसंघाश्च व्यतिष्ठन्त दिदृक्षया ।
तदनन्तर वह युद्ध देखनेकी इच्छासे आकाशमें बहुत-से देवता, सहस्रों गन्धर्व, ऋषि और सिद्धसमुदाय खड़े हो गये ॥ ३७ १/२ ॥
तदप्सरोभिराकीर्णं यक्षगन्धर्वसंकुलम् ॥ ३८ ॥
श्रीमदाकाशमभवद् भूयो मेघाकुलं यथा ।
अप्सराओं, यक्षों और गन्धर्वोंसे भरा हुआ आकाश ऐसी विशिष्ट शोभा पा रहा था, मानो उसमें मेघोंकी घटा घिर आयी हो ॥ ३८ १/२ ॥
तत्र स्मान्तर्हिता वाचो व्यचरन्त पुनः पुनः ॥ ३९ ॥
द्रोणपार्थस्तवोपेता व्यश्रूयन्त नराधिप ।