महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1348, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपतद् रक्षः स्वेन कायेन तूर्ण-
मतिप्रमाणेन विवर्धता च ।
प्रियं कुर्वन् पाण्डवानां गतासु-
रक्षौहिणीं तव तूर्णं जघान ॥ ६२ ॥
पाण्डवोंका प्रिय करनेवाले उस राक्षसने प्राणशून्य हो जानेपर भी अपने बढ़ते हुए अत्यन्त विशाल शरीरसे गिरकर आपकी एक अक्षौहिणी सेनाको तुरंत नष्ट कर दिया ॥
ततो मिश्राः प्राणदन् सिंहनादै-
र्भैर्यः शङ्खा मुरजाश्चानकाश्च ।
दग्धां मायां निहतं राक्षसं च
दृष्ट्वा हृष्टाः प्राणदन् कौरवेयाः ॥ ६३ ॥
तदनन्तर सिंहनादोंके साथ-साथ भेरी, शंख, नगाड़े और आनक आदि बाजे बजने लगे। माया भस्म हुई और राक्षस मारा गया—यह देखकर हर्षमें भरे हुए कौरव-सैनिक जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ६३ ॥
ततः कर्णः कुरुभिः पूज्यमानो
यथा शक्रो वृत्रवधे मरुद्भिः ।
अन्वारूढस्तव पुत्रस्य यानं