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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1339, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1339

तमोभूते सायकैरन्तरिक्षे ॥ २२ ॥
तब शीघ्रतापूर्वक विचित्र रीतिसे अस्त्रयुद्ध करनेवाले कर्णने अपने बाणोंके समूहसे सम्पूर्ण दिशाओंको ढक दिया। उस समय बाणोंसे आकाशमें अँधेरा छा गया था तो भी वहाँ कोई प्राणी ऊपरसे मरकर गिरा नहीं ॥ २२ ॥
नैवाददानो न च संदधानो
न चेषुधीः स्पृश्यमानः कराग्रैः ।
अदृश्यद् वै लाघवात् सूतपुत्रः
सर्वं बाणैश्छादयानोऽन्तरिक्षम् ॥ २३ ॥
सूतपुत्र कर्ण जब शीघ्रतापूर्वक बाणोंद्वारा समूचे आकाशको आच्छादित कर रहा था, उस समय यह नहीं दिखायी देता था कि वह कब अपने हाथकी अंगुलियोंसे तरकसको छूता है, कब बाण निकालता है और कब उसे धनुषपर रखता है ॥ २३ ॥
ततो मायां दारुणामन्तरिक्षे
घोरां भीमां विहितां राक्षसेन ।
अपश्याम लोहिताभ्रप्रकाशां
देदीप्यन्तीमग्निशिखामिवोग्राम् ॥ २४ ॥
तदनन्तर हमने अन्तरिक्षमें उस राक्षसद्वारा रची गयी घोर, दारुण एवं भयंकर माया देखी। पहले तो वह लाल रंगके बादलोंके रूपमें प्रकाशित हुई, फिर आगकी भयंकर लपटोंके समान प्रज्वलित हो उठी ॥ २४ ॥
ततस्तस्यां विद्युतः प्रादुरास-
न्नुल्काश्चापि ज्वलिताः कौरवेन्द्र ।
घोषश्चास्याः प्रादुरासीत् सुघोरः
सहस्रशो नदतां दुन्दुभीनाम् ॥ २५ ॥
कौरवराज! तत्पश्चात् उससे बिजलियाँ प्रकट हुईं और जलती हुई उल्काएँ गिरने लगीं। साथ ही हजारों दुन्दुभियोंके बजनेके समान बड़ी भयानक आवाज होने लगी ॥ २५ ॥
ततः शराः प्रापतन् रुक्मपुङ्खाः
शक्त्यृष्टिप्रासमुसलान्यायुधानि ।
परश्वधास्तैलधौताश्च खड्गाः
प्रदीप्ताग्रास्तोমরাः पट्टिशाश्च ॥ २६ ॥
मयूखिनः परिघा लोहबद्धा
गदाश्चित्राः शितधाराश्च शूलाः ।
गुर्व्यो गदा हेमपट्टावनद्धाः
शतघ्न्यश्च प्रादुरासन् समन्तात् ॥ २७ ॥