महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1336, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमेघानामिव घर्मान्ते बभूव तुमलो निशि ॥ ७ ॥
उस रात्रिके समय उनकी प्रत्यंचाकी टंकार तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटका शब्द वर्षाकालके मेघोंकी गर्जनाके समान भयंकर जान पड़ता था ॥ ७ ॥
ज्यानेमिघोषस्तनयित्नुमान् वै
धनुस्तडिन्मण्डलकेतुशृङ्गः ।
शरौघवषाकुलवृष्टिमांश्च
संग्राममेघः स बभूव राजन् ॥ ८ ॥
राजन्! वह संग्राम वर्षाकालीन मेघके समान प्रतीत होता था। प्रत्यंचाकी टंकार और पहियोंकी घर्घराहटका शब्द ही उस मेघकी गर्जनाके समान था। धनुष ही विद्युन्मण्डलके समान प्रकाशित होता था और ध्वजाका अग्रभाग ही उस मेघका उच्चतम शिखर था तथा बाण-समूहोंकी वृष्टि ही उसके द्वारा की जानेवाली वर्षा थी ॥ ८ ॥
तदद्भुतं शैल इवाप्रकम्पो
वर्षं महाशैलसमानसारः ।
विध्वंसयामास रणे नरेन्द्र
वैकर्तनः शत्रुगणावमर्दी ॥ ९ ॥
नरेन्द्र! महान् पर्वतके समान शक्तिशाली एवं अविचल रहनेवाले शत्रुदलसंहारक सूर्यपुत्र कर्णने रणभूमिमें उस अद्भुत बाणवर्षाको नष्ट कर दिया ॥ ९ ॥
ततोऽतुलैर्वज्रनिपातकल्पैः
शितैः शरैः काञ्चनचित्रपुङ्खैः ।
शत्रून् व्यपोहत् समरे महात्मा
वैकर्तनः पुत्रहिते रतस्ते ॥ १० ॥
तत्पश्चात् आपके पुत्रके हितमें तत्पर रहनेवाले महामनस्वी वैकर्तन कर्णने समरांगणमें सोनेके विचित्र पंखोंसे युक्त एवं वज्रपातके तुल्य भयंकर, तुलनारहित तीखे बाणोंद्वारा शत्रुओंका संहार आरम्भ किया ॥ १० ॥
संछिन्नभिन्नध्वजिनश्च केचित्
केचिच्छरैर्दितभिन्नदेहाः ।
केचिद् विसूता विहयाश्च केचिद्
वैकर्तनेनाशु कृता बभूवुः ॥ ११ ॥
वैकर्तन कर्णने वहाँ शीघ्र ही किन्हींकी ध्वजाके टुकड़े-टुकड़े कर दिये, किन्हींके शरीरोंको बाणोंसे पीड़ित करके विदीर्ण कर डाला, किन्हींके सारथि नष्ट कर दिये और किन्हींके घोड़े मार डाले ॥ ११ ॥
अविन्दमानास्त्वथ शर्म संख्ये
यौधिष्ठिरं ते बलमभ्यपद्यन् ।