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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 132

यह देख द्रुपदने कुपित हो शीघ्र ही झुकी हुई गाँठवाले बाणके द्वारा महारथी भगदत्तकी छातीमें प्रहार किया ॥ ४२ ॥
युद्धं योधवरौ लोके सौमदत्तिशिखण्डिनौ ।
भूतानां त्रासजननं चक्रातेऽस्त्रविशारदौ ॥ ४३ ॥
भूरिश्रवा और शिखण्डी—ये दोनों संसारके श्रेष्ठ योद्धा और अस्त्रविद्याके विशेषज्ञ थे। उन दोनोंने सम्पूर्ण भूतोंको त्रास देनेवाला युद्ध किया ॥ ४३ ॥
भूरिश्रवा रणे राजन् याज्ञसेनिं महारथम् ।
महता सायकौघेन छादयामास वीर्यवान् ॥ ४४ ॥
राजन्! पराक्रमी भूरिश्रवाने रणक्षेत्रमें द्रुपदपुत्र महारथी शिखण्डीको सायकसमूहोंकी भारी वर्षा करके आच्छादित कर दिया ॥ ४४ ॥
शिखण्डी तु ततः क्रुद्धः सौमदत्तिं विशाम्पते ।
नवत्या सायकानां तु कम्पयामास भारत ॥ ४५ ॥
प्रजानाथ! भरतनन्दन! तब क्रोधमें भरे हुए शिखण्डीने नब्बे बाण मारकर सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाको कम्पित कर दिया ॥ ४५ ॥
राक्षसौ रौद्रकर्माणौ हैडिम्बालम्बुषावुभौ ।
चक्रातेऽत्यद्भुतं युद्धं परस्परजयैषिणौ ॥ ४६ ॥
भयंकर कर्म करनेवाले राक्षस घटोत्कच और अलम्बुष—ये दोनों एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अत्यन्त अद्भुत युद्ध करने लगे ॥ ४६ ॥
मायाशतसृजौ दृप्तौ मायाभिरितरेतरम् ।
अन्तर्हितौ चेरतुस्तौ भृशं विस्मयकारिणौ ॥ ४७ ॥
वे घमंडमें भरे हुए निशाचर सैकड़ों मायाओंकी सृष्टि करते और मायाद्वारा ही एक-दूसरेको परास्त करना चाहते थे। वे लोगोंको अत्यन्त आश्चर्यमें डालते हुए अदृश्यभावसे विचर रहे थे ॥ ४७ ॥
चेकितानोऽनुविन्देन युयुधे चातिभैरवम् ।
यथा देवासुरे युद्धे बलशक्रौ महाबलौ ॥ ४८ ॥
चेकितान अनुविन्दके साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगे, मानो देवासुर-संग्राममें महाबली बल और इन्द्र लड़ रहे हों ॥ ४८ ॥
लक्ष्मणः क्षत्रदेवेन विमर्दमकरोद् भृशम् ।
यथा विष्णुः पुरा राजन् हिरण्याक्षेण संयुगे ॥ ४९ ॥
राजन्! जैसे पूर्वकालमें भगवान् विष्णु हिरण्याक्षके साथ युद्ध करते थे, उसी प्रकार उस रणक्षेत्रमें लक्ष्मण क्षत्रदेवके साथ भारी संग्राम कर रहा था ॥ ४९ ॥
ततः प्रचलिताश्वेन विधिवत्कल्पितेन च ।
रथेनाभ्यपतद् राजन् सौभद्रं पौरवो नदन् ॥ ५० ॥