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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1315, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1315

यदवप्लुत्य जग्राह देवसृष्टां महाशनिम् ॥ १०० ॥
उस समय वहाँ सम्पूर्ण प्राणी कर्णकी प्रशंसा करने लगे; क्योंकि उसने महादेवजीकी बनायी हुई उस विशाल अशनिको अनायास ही उछलकर पकड़ लिया था ॥ १०० ॥
एवं कृत्वा रणे कर्ण आरुरोह रथं पुनः ।
ततो मुमोच नाराचान् सूतपुत्रः परंतप ॥ १०१ ॥
रणभूमिमें ऐसा पराक्रम करके कर्ण पुनः अपने रथपर आ बैठा। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! फिर सूतपुत्र कर्ण नाराचोंकी वर्षा करने लगा ॥ १०१ ॥
अशक्यं कर्तुमन्येन सर्वभूतेषु मानद ।
यदकार्षीत् तदा कर्णः संग्रामे भीमदर्शने ॥ १०२ ॥
दूसरोंको सम्मान देनेवाले महाराज! उस भयंकर संग्राममें कर्णने उस समय जो कार्य किया था, उसे सम्पूर्ण प्राणियोंमें दूसरा कोई नहीं कर सकता था ॥ १०२ ॥
स हन्यमानो नाराचैर्धाराभिरिव पर्वतः ।
गन्धर्वनगराकारः पुनरन्तरधीयत ॥ १०३ ॥
जैसे पर्वतपर जलकी धाराएँ गिरती हैं, उसी प्रकार नाराचोंके प्रहारसे आहत हुआ घटोत्कच गन्धर्व-नगरके समान पुनः अदृश्य हो गया ॥ १०३ ॥
एवं स वै महाकायो मायया लाघवेन च ।
अस्त्राणि तानि दिव्यानि जघान रिपुसूदनः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार शत्रुओंका संहार करनेवाले विशालकाय घटोत्कचने अपनी माया तथा अस्त्र-संचालनकी शीघ्रतासे कर्णके उन दिव्यास्त्रोंको नष्ट कर दिया ॥ १०४ ॥
निहन्यमानेष्वस्त्रेषु मायया तेन रक्षसा ।
असम्भ्रान्तस्तदा कर्णस्तद् रक्षः प्रत्ययुध्यत ॥ १०५ ॥
उस राक्षसके द्वारा मायासे अपने अस्त्रोंके नष्ट हो जानेपर भी उस समय कर्णके मनमें तनिक भी घबराहट नहीं हुई। वह उस राक्षसके साथ युद्ध करता ही रहा ॥ १०५ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज भैमसेनिर्महाबलः ।
चकार बहुधाऽऽत्मानं भीषयाणो महारथान् ॥ १०६ ॥
महाराज! तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए महाबली भीमसेनकुमार घटोत्कचने महारथियोंको भयभीत करते हुए अपने बहुत-से रूप बना लिये ॥ १०६ ॥
ततो दिग्भ्यः समापेतुः सिंहव्याघ्रतरक्षवः ।
अग्निजिह्वाश्च भुजगा विहगाश्चाप्ययोमुखाः ॥ १०७ ॥
तदनन्तर सम्पूर्ण दिशाओंसे सिंह, व्याघ्र, तरक्षु (जरख) अग्निमयी जिह्वावाले सर्प तथा लोहमय चंचुवाले पक्षी आक्रमण करने लगे ॥ १०७ ॥
स कीर्यमाणो विशिखैः कर्णचापच्युतैः शरैः ।
नागराडिव दुष्प्रेक्ष्यस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १०८ ॥