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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1288, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1288

सततं चानुरक्तो वो हितैषी च घटोत्कचः ।
विजेष्यति रणे कर्णमिति मे नात्र संशयः ॥ ४१ ॥
घटोत्कच तुमलोगोंका हितैषी है और सदा तुम्हारे प्रति अनुराग रखता है। वह रणभूमिमें कर्णको जीत लेगा, इसमें मुझे संशय नहीं है ॥ ४१ ॥
एवमुक्तो महाबाहुः पार्थः पुष्करलोचनः ।
आजुहावाथ तद् रक्षस्तच्चासीत् प्रादुरग्रतः ॥ ४२ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर महाबाहु कमलनयन कुन्तीकुमारने राक्षस घटोत्कचका आवाहन किया और वह तत्काल उनके सामने प्रकट हो गया ॥
कवची सशरः खड्गी सधन्वा च विशाम्पते ।
अभिवाद्य ततः कृष्णं पाण्डवं च धनंजयम् ।
अब्रवीच्च तदा कृष्णमयमस्यानुशाधि माम् ॥ ४३ ॥
प्रजानाथ! उसने कवच, धनुष, बाण और खड्ग धारण कर रखे थे। वह श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र धनंजयको प्रणाम करके उस समय भगवान् श्रीकृष्णसे बोला—'प्रभो! यह मैं सेवामें उपस्थित हूँ। मुझे आज्ञा दीजिये, क्या करूँ?' ॥
ततस्तं मेघसंकाशं दीप्तास्यं दीप्तकुण्डलम् ।
अभ्यभाषत हैडिम्बिं दाशार्हः प्रहसन्निव ॥ ४४ ॥
तदनन्तर प्रज्वलित मुख और प्रकाशित कुण्डलोंवाले मेघके समान काले हिडिम्बाकुमार घटोत्कचसे भगवान् श्रीकृष्णने हँसते हुए-से कहा ॥ ४४ ॥

श्रीवासुदेव उवाच

घटोत्कच विजानीहि यत् त्वां वक्ष्यामि पुत्रक ।
प्राप्तो विक्रमकालोऽयं तव नान्यस्य कस्यचित् ॥ ४५ ॥
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**बेटा घटोत्कच! मैं तुमसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनो और समझो। यह तुम्हारे लिये ही पराक्रम दिखानेका अवसर आया है, दूसरे किसीके लिये नहीं ॥ ४५ ॥
स भवान् मज्जमानानां बन्धूनां त्वं प्लवो भव ।
विविधानि तवास्त्राणि सन्ति माया च राक्षसी ॥ ४६ ॥
तुम्हारे ये बन्धु संकटके समुद्रमें डूब रहे हैं, तुम इनके जहाज बन जाओ। तुम्हारे पास नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र हैं और तुममें राक्षसी मायाका भी बल है ॥ ४६ ॥
पश्य कर्णेन हैडिम्बे पाण्डवानामनीकिनी ।
काल्यमाना यथा गावः पालेन रणमूर्धनि ॥ ४७ ॥
हिडिम्बानन्दन! देखो, जैसे चरवाहा गायोंको हाँकता है, उसी प्रकार युद्धके मुहानेपर खड़ा हुआ कर्ण पाण्डवोंकी इस विशाल सेनाको खदेड़ रहा है ॥ ४७ ॥