महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'मामा! तुम युद्धसे पीछे न हटनेवाले दस हजार हाथियों और उतने ही रथोंके साथ तुरंत ही अर्जुनका सामना करनेके लिये जाओ ।। ६२ ।।
दुःशासनो दुर्विषहः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः ।
एते त्वामनुयास्यन्ति पत्तिभिर्बहुभिर्वृताः ।। ६३ ।।
'दुःशासन, दुर्विषह, सुबाहु और दुष्प्रधर्षण—ये (महारथी) बहुत-से पैदल सैनिकोंको साथ लेकर तुम्हारे पीछे-पीछे जायँगे ।। ६३ ।।
जहि कृष्णौ महाबाहो धर्मराजं च मातुल ।
नकुलं सहदेवं च भीमसेनं तथैव च ।। ६४ ।।
'मेरे महाबाहु मामा! तुम श्रीकृष्ण, अर्जुन, धर्मराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा भीमसेनको भी मार डालो ।। ६४ ।।
देवानाामिव देवेन्द्रे जयाशा त्वयि मे स्थिता ।
जहि मातुल कौन्तेयानसुरानिव पावकिः ।। ६५ ।।
'मामा! जैसे देवताओंकी आशा देवराज इन्द्रपर लगी रहती है, उसी प्रकार मेरी विजयकी आशा तुमपर अवलम्बित है। जैसे अग्निकुमार स्कन्दने असुरोंका संहार किया था, उसी प्रकार तुम भी कुन्तीकुमारोंका वध करो' ।। ६५ ।।
एवमुक्तो ययौ पार्थान् पुत्रेण तव सौबलः ।
महत्या सेनया सार्धं सह पुत्रैश्च ते विभो ।। ६६ ।।
प्रभो! आपके पुत्र दुर्योधनके ऐसा कहनेपर शकुनि विशाल सेना और आपके अन्य पुत्रोंके साथ कुन्तीकुमारोंका सामना करनेके लिये गया ।। ६६ ।।
प्रियार्थं तव पुत्राणां दिधक्षुः पाण्डुनन्दनान् ।
ततः प्रवृत्ते युद्धं तावकानां परैः सह ।। ६७ ।।
वह आपके पुत्रोंका प्रिय करनेके लिये पाण्डवोंको भस्म कर देना चाहता था। फिर तो आपके योद्धाओंका शत्रुओंके साथ घोर युद्ध आरम्भ हो गया ।। ६७ ।।
प्रयाते सौबले राजन् पाण्डवानामनीकिनीम् ।
बलेन महता युक्तः सूतपुत्रस्तु सात्वतम् ।। ६८ ।।
अभ्ययात् त्वरितो युद्धे किरन् शरशतान् बहून् ।
तथैव पार्थिवाः सर्वे सात्यकिं पर्यवारयन् ।। ६९ ।।
राजन्! जब शकुनि पाण्डव-सेनाकी ओर चला गया, तब विशाल सेनाके साथ सूतपुत्र कर्णने युद्धस्थलमें कई सौ बाणोंकी वर्षा करते हुए तुरंत ही सात्यकिपर आक्रमण किया। इसी प्रकार अन्य सब राजाओंने भी सात्यकिको घेर लिया ।। ६८-६९ ।।
भारद्वाजस्ततो गत्वा धृष्टद्युम्नरथं प्रति ।
महद् युद्धं तदाऽऽसीत् तु द्रोणस्य निशि भारत ।
धृष्टद्युम्नेन वीरेण पञ्चालैश्च सहाद्भुतम् ।। ७० ।।