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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1169, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1169

अजय्याश्च रणे पार्था देवैरपि सवासवैः ।। ५० ।।
सदैत्ययक्षगन्धर्वैः पिशाचोरगराक्षसैः ।
'यह भी ठीक है कि कुन्तीके पुत्रोंको रणभूमिमें इन्द्र आदि देवता, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षस भी जीत नहीं सकते ।। ५० १/२ ।।
तथापि पार्थाञ्जेष्यामि शक्त्या वासवदत्तया ।। ५१ ।।
मम ह्यमोघा दत्तेयं शक्तिः शक्रेण वै द्विज ।
एतया निहनिष्यामि सव्यसाचिनमाहवे ।। ५२ ।।
'तथापि मैं इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे कुन्तीके पुत्रोंको जीत लूँगा। ब्रह्मन्! मुझे इन्द्रने यह अमोघ शक्ति दे रखी है; इसके द्वारा मैं सव्यसाची अर्जुनको युद्धमें अवश्य मार डालूँगा ।। ५१-५२ ।।
हते तु पाण्डवे कृष्णे भ्रातरश्चास्य सोदराः ।
अनर्जुना न शक्ष्यन्ति महीं भोक्तुं कथञ्चन ।। ५३ ।।
'पाण्डुपुत्र अर्जुनके मारे जानेपर उनके बिना उनके सहोदर भाई किसी तरह इस पृथ्वीका राज्य नहीं भोग सकेंगे ।। ५३ ।।
तेषु नष्टेषु सर्वेषु पृथिवीयं ससागरा ।
अयत्नात् कौरवेन्द्रस्य वशे स्थास्यति गौतम ।। ५४ ।।
'गौतम! उन सबके नष्ट हो जानेपर बिना किसी प्रयत्नके ही यह समुद्रसहित सारी पृथ्वी कौरवराज दुर्योधनके वशमें हो जायगी ।। ५४ ।।
सुनीतैरिह सर्वार्थाः सिध्यन्ते नात्र संशयः ।
एतमर्थमहं ज्ञात्वा ततो गर्जामि गौतम ।। ५५ ।।
'गौतम! इस संसारमें सुनीतिपूर्ण प्रयत्नोंसे सारे कार्य सिद्ध होते हैं, इसमें संशय नहीं है। इस बातको समझकर ही मैं गर्जना करता हूँ ।। ५५ ।।
त्वं तु विप्रश्च वृद्धश्च अशक्तश्चापि संयुगे ।
कृतस्नेहश्च पार्थेषु मोहान्मामवमन्यसे ।। ५६ ।।
'तुम तो ब्राह्मण और उसमें भी बूढ़े हो। तुममें युद्ध करनेकी शक्ति है ही नहीं। इसके सिवा, तुम कुन्तीके पुत्रोंपर स्नेह रखते हो; इसलिये मोहवश मेरा अपमान कर रहे हो ।। ५६ ।।
यद्येवं वक्ष्यसे भूयो ममाप्रियमिह द्विज ।
ततस्ते खड्गमुद्यम्य जिह्वां छेत्स्यामि दुर्मते ।। ५७ ।।
'दुर्बुद्धि ब्राह्मण! यदि यहाँ पुनः इस प्रकार मुझे अप्रिय लगनेवाली बात बोलोगे तो मैं अपनी तलवार उठाकर तुम्हारी जीभ काट लूँगा ।। ५७ ।।
यच्चापि पाण्डवान् विप्र स्तोतुमिच्छसि संयुगे ।
भीषयन् सर्वसैन्यानि कौरवेयाणि दुर्मते ।। ५८ ।।