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सर्वकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 796, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 796

राजन्! इतनेमें ही पुण्यरहित पुरुषोंको स्वर्गसे नीचे गिरानेवाला कोई पुरुष देवराजकी आज्ञासे वहाँ आकर ययातिसे इस प्रकार बोला— ।। ६ ।।
अतीव मदमत्तस्त्वं न कंचिन्नावरमन्यसे ।
मानेन भ्रष्टः स्वर्गस्ते नार्हस्त्वं पार्थिवात्मज ।। ७ ।।
‘राजपुत्र! तुम अत्यन्त मदमत्त हो और कोई भी ऐसा महान् पुरुष यहाँ नहीं है, जिसका तुम तिरस्कार न करते हो। इस मानके कारण ही तुम अपने स्थानसे गिर रहे हो। अब तुम यहाँ रहनेके योग्य नहीं हो ।। ७ ।।
न च प्रज्ञायसे गच्छ पतस्वेति तमब्रवीत् ।
पतेयं सत्स्विति वचस्त्रिरुक्त्वा नहुषात्मजः ।। ८ ।।
‘तुम्हें यहाँ कोई नहीं जानता है; अतः जाओ, नीचे गिरो।’ जब उसने ऐसा कहा, तब नहुषपुत्र ययाति तीन बार ऐसा कहकर नीचे जाने लगे कि मैं सत्पुरुषोंके बीचमें गिरूँ ।।
पतिष्यंश्चिन्तयामास गतिं गतिमतां वरः ।
एतस्मिन्नेव काले तु नैमिषे पार्थिवर्षभान् ।। ९ ।।
चतुरोऽपश्यत नृपस्तेषां मध्ये पपात ह ।
जंगम प्राणियोंमें श्रेष्ठ ययाति गिरते समय अपनी गतिके विषयमें चिन्ता कर रहे थे। इसी समय उन्होंने नैमिषारण्यमें चार श्रेष्ठ राजाओंको देखा और उन्हींके बीचमें वे गिरने लगे ।। ९ १/२ ।।
प्रतर्दनो वसुमनाः शिबिरौशीनरोऽष्टकः ।। १० ।।
वाजपेयेन यज्ञेन तर्पयन्ति सुरेश्वरम् ।
वहाँ प्रतर्दन, वसुमना, औशीनर शिबि तथा अष्टक—ये चार नरेश वाजपेययज्ञके द्वारा देवेश्वर श्रीहरिको तृप्त करते थे ।। १० १/२ ।।
तेषामध्वरजं धूमं स्वर्गद्वारमुपस्थितम् ।। ११ ।।
ययातिरूपजिघ्रन् वै निपपात महीं प्रति ।
उनके यज्ञका धूम मानो स्वर्गका द्वार बनकर उपस्थित हुआ था। ययाति उसीको सूँघते हुए पृथिवीकी ओर गिर रहे थे ।। ११ १/२ ।।
भूमौ स्वर्गे च सम्बद्धां नदीं धूममयीमिव ।
गङ्गां गामिव गच्छन्तीमालम्ब्य जगतीपतिः ।। १२ ।।
श्रीमत्स्ववभृथाग्र्येषु चतुर्षु प्रतिबन्धुषु ।
मध्ये निपतितो राजा लोकपालोपमेषु सः ।। १३ ।।
भूतलसे स्वर्गतक धूममयी नदी-सी प्रवाहित हो रही थी, मानो आकाशगंगा भूमिपर जा रही हों। भूपाल ययाति उसी धूमलेखाका अवलम्बन करके लोकपालोंके समान तेजस्वी तथा अवभृथ स्नानसे पवित्र अपने चारों सम्बन्धियोंके बीचमें गिरे ।। १२-१३ ।।
चतुर्षु हुतकल्पेषु राजसिंहमहाग्निषु ।