महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 739, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंहो सकता है, वहाँ भाई-बन्धु नहीं ठहर सकते ॥ ५ ॥
श्रोतव्यमपि पश्यामि सुहृदां कुरुनन्दन ।
न कर्तव्यश्च निर्बन्धो निर्बन्धो हि सुदारुणः ॥ ६ ॥
कुरुनन्दन! मैं देखता हूँ कि तुम्हें अपने सुहृदोंके उपदेशको सुननेकी विशेष आवश्यकता है; अतः तुम्हें किसी एक बातका दुराग्रह नहीं रखना चाहिये। आग्रहका परिणाम बड़ा भयंकर होता है ॥ ६ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यथा निर्बन्धतः प्राप्तो गालवेन पराजयः ॥ ७ ॥
इस विषयमें विज्ञ पुरुष इस पुरातन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिससे ज्ञात होता है कि महर्षि गालवने हठ या दुराग्रहके कारण पराजय प्राप्त की थी ॥ ७ ॥
विश्वामित्रं तपस्यन्तं धर्मो जिज्ञासया पुरा ।
अभ्यगच्छत् स्वयं भूत्वा वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ ८ ॥
पहलेकी बात है, साक्षात् धर्मराज महर्षि भगवान् वसिष्ठका रूप धारण करके तपस्यामें लगे हुए विश्वामित्रके पास उनकी परीक्षा लेनेके लिये आये ॥ ८ ॥
सप्तर्षीणामन्यतमं वेषमास्थाय भारत ।
बुभुक्षुः क्षुभितो राजन्नाश्रमं कौशिकस्य तु ॥ ९ ॥
भारत! धर्म सप्तर्षियोंमेंसे एक (वसिष्ठजी)-का वेष धारण करके भूखसे पीड़ित हो भोजनकी इच्छासे विश्वामित्रके आश्रमपर आये ॥ ९ ॥
विश्वामित्रोऽथ सम्भ्रान्तः श्रपयामास वै चरुम् ।
परमान्नस्य यत्नेन न च तं प्रत्यपालयत् ॥ १० ॥
विश्वामित्रजीने बड़ी उतावलीके साथ उनके लिये उत्तम भोजन देनेकी इच्छासे यत्नपूर्वक चरुपाक बनाना आरम्भ किया; परंतु ये अतिथिदेवता उनकी प्रतीक्षा न कर सके ॥ १० ॥
अन्नं तेन तदा भुक्तमन्यैर्दत्तं तपस्विभिः ।
अथ गृह्यान्नमत्युष्णं विश्वामित्रोऽप्युपागमत् ॥ ११ ॥
उन्होंने जब दूसरे तपस्वी मुनियोंका दिया हुआ अन्न खा लिया, तब विश्वामित्रजी भी अत्यन्त उष्ण भोजन लेकर उनकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ११ ॥
भुक्तं मे तिष्ठ तावत् त्वमित्युक्त्वा भगवान् ययौ ।
विश्वामित्रस्ततो राजन् स्थित एव महाद्युतिः ॥ १२ ॥
उस समय भगवान् धर्म यह कहकर कि मैंने भोजन कर लिया, अब तुम रहने दो, वहाँसे चल दिये। राजन्! तब महातेजस्वी विश्वामित्र मुनि वहाँ उसी अवस्थामें खड़े ही रह गये ॥ १२ ॥
भक्तं प्रगृह्य मूर्ध्ना वै बाहुभ्यां संशितव्रतः ।