महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 715, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमातले! तुम, तुम्हारा पुत्र गोमुख तथा पुत्रसहित शचीपति देवराज इन्द्र अनेक बार इनके सामनेसे मैदान छोड़कर भाग चुके हैं॥ ८॥
पश्य वेश्मानि रौक्माणि मातले राजतानि च।
कर्मणा विधियुक्तेन युक्तान्युपगतानि च॥ ९॥
मातले! देखो, इनके ये सोने और चाँदीके भवन कितनी शोभा पा रहे हैं। इनका निर्माण शिल्पशास्त्रीय विधानके अनुसार हुआ है तथा ये सभी महल एक-दूसरेसे सटे हुए हैं॥ ९॥
वैदूर्यमणिचित्राणि प्रवालरुचिराणि च।
अर्कस्फटिकशुभ्राणि वज्रसारोज्ज्वलानि च॥ १०॥
इन सबमें वैदूर्यमणि जड़ी हुई है, जिससे इनकी विचित्र शोभा हो रही है। स्थान-स्थानपर मूँगोंसे सुसज्जित होनेके कारण इनका सौन्दर्य अधिक बढ़ गया है। आकके फूल और स्फटिकमणिके समान ये उज्ज्वल दिखायी देते हैं तथा उत्तम हीरोंसे जटित होनेके कारण इनकी दीप्ति अधिक बढ़ गयी है॥ १०॥
पार्थिवानीव चाभान्ति पद्मरागमयानि च।
शैलानीव च दृश्यन्ते दारुवाणीव चाप्युत॥ ११॥
इनमेंसे कुछ तो मिट्टीके बने हुए-से जान पड़ते हैं, कुछ पद्मरागमणिद्वारा निर्मित प्रतीत होते हैं, कुछ मकान पत्थरोंके और कुछ लकड़ियोंके बने हुए-से दिखायी देते हैं॥ ११॥
सूर्यरूपाणि चाभान्ति दीप्ताग्निसदृशानि च।
मणिजालविचित्राणि प्रांशूनि निबिडानि च॥ १२॥
ये सूर्य तथा प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे हैं। मणियोंकी झालरोंसे इनकी विचित्र छटा दृष्टिगोचर हो रही है। ये सभी भवन ऊँचे और घने हैं॥ १२॥
नैतानि शक्यं निर्देष्टुं रूपतो द्रव्यतस्तथा।
गुणतश्चैव सिद्धानि प्रमाणगुणवन्ति च॥ १३॥
हिरण्यपुरके ये भवन कितने सुन्दर हैं और किन-किन द्रव्योंसे बने हुए हैं, इसका निरूपण नहीं किया जा सकता। अपने उत्तम गुणोंके कारण इनकी बड़ी प्रसिद्धि है। लंबाई-चौड़ाई तथा सर्वगुणसम्पन्नताकी दृष्टिसे ये सभी प्रशंसाके योग्य हैं॥ १३॥
आक्रीडान् पश्य दैत्यानां तथैव शयनान्युत।
रत्नवन्ति महार्हाणि भाजनान्यासनानि च॥ १४॥
देखो, दैत्योंके उद्यान एवं क्रीड़ास्थान कितने सुन्दर हैं! इनकी शय्याएँ भी इनके अनुरूप ही हैं। इनके उपयोगमें आनेवाले पात्र और आसन भी रत्नजटित एवं बहुमूल्य हैं॥ १४॥
जलदाभांस्तथा शैलांस्तोयप्रस्रवणानि च।
कामपुष्पफलांश्चापि पादपान् कामचारिणः॥ १५॥