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सर्वकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 510

पितामह विजानीषे पार्थेषु विजयं कथम् ।
नाहं भवति न द्रोणे न कृपे न च बाह्लिके ॥ ४ ॥
अन्येषु च नरेन्द्रेशु पराक्रम्य समारभे ।
दादाजी! ऐसी दशामें भी आप कैसे जानते हैं कि विजय कुन्तीपुत्रोंकी ही होगी। मैं, आप, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, बाह्लिक तथा अन्य राजाओंके पराक्रमका भरोसा करके युद्धका आरम्भ नहीं कर रहा हूँ॥ ४ १/२ ॥
अहं वैकर्तनः कर्णो भ्राता दुःशासनश्च मे ॥ ५ ॥
पाण्डवान् समरे पञ्च हनिष्यामः शितैः शरैः ।
मैं, विकर्तनपुत्र कर्ण तथा मेरा भाई दुःशासन—हम तीन ही मिलकर युद्धभूमिमें पाँचों पाण्डवोंको तीक्ष्ण बाणोंसे मार डालेंगे॥ ५ १/२ ॥
ततो राजन् महायज्ञैर्विविधैर्भूरिदक्षिणैः ॥ ६ ॥
ब्राह्मणांस्तर्पयिष्यामि गोभिरश्वैर्धनेन च ।
राजन्! तदनन्तर पर्याप्त दक्षिणावाले विविध महायज्ञोंका अनुष्ठान करके गायें, घोड़े और धन दानमें देकर ब्राह्मणोंको तृप्त करूँगा॥ ६ १/२ ॥