महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2330, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंयावच्चमूं महाराज नाशयन्ति न सर्वशः ॥ ४९ ॥
तावत् ते पाण्डवैर्वीरैः सौहार्दं मम रोचते ।
युद्धं मदन्तमेवास्तु तात संशाम्य पाण्डवैः ॥ ५० ॥
‘महाराज! नकुल-सहदेव तथा पाण्डुपुत्र भीमसेन—ये सब मिलकर जबतक तुम्हारी सेनाका सर्वनाश नहीं कर डालते हैं, तभीतक पाण्डववीरोंके साथ तुम्हारा सौहार्द स्थापित हो जाय, यही मुझे अच्छा लगता है। तात! मेरे साथ ही इस युद्धका भी अन्त हो जाय। तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो ।। ४९-५० ।।
एतत् तु रोचतां वाक्यं यदुक्तोऽसि मयानघ ।
एतत् क्षेममहं मन्ये तव चैव कुलस्य च ॥ ५१ ॥
‘अनघ! मैंने जो बातें तुमसे कही हैं, वे तुम्हें रुचिकर प्रतीत हों। मैं संधिको ही तुम्हारे तथा कौरवकुलके लिये कल्याणकारी मानता हूँ ॥ ५१ ॥
त्यक्त्वा मन्युं व्युपशाम्यस्व पार्थैः
पर्याप्तमेतद् यत् कृतं फाल्गुनेन ।
भीष्मस्यान्तादस्तु वः सौहृदं च
जीवन्तु शेषाः साधु राजन् प्रसीद ॥ ५२ ॥
‘राजन्! तुम क्रोध छोड़कर कुन्तीकुमारोंके साथ संधि स्थापित कर लो। अर्जुनने आजतक जो कुछ किया है, उतना ही बहुत है। मुझ भीष्मके जीवनका अन्त होनेसे (तुम्हारे वैरका भी अन्त हो जाय) तुमलोगोंमें प्रेम-सम्बन्ध स्थापित हो और जो लोग मरनेसे बचे हैं, वे अच्छी तरह जीवित रहें। इसके लिये तुम प्रसन्न हो जाओ ।। ५२ ।।
राज्यस्यार्धं दीयतां पाण्डवाना-
मिन्द्रप्रस्थं धर्मराजोऽभियातु ।
मा मित्रध्रुक् पार्थिवानां जघन्यः
पापां कीर्तिं प्राप्स्यसे कौरवेन्द्र ॥ ५३ ॥
‘तुम पाण्डवोंका आधा राज्य दे दो। धर्मराज युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थ चले जायें। कौरवराज! ऐसा करनेसे तुम राजाओंमें मित्रद्रोही और नीच नहीं कहलाओगे तथा तुम्हें पापपूर्ण अपयश नहीं प्राप्त होगा ।। ५३ ।।
ममावसानाच्छान्तिरस्तु प्रजानां
संगच्छन्तां पार्थिवाः प्रीतिमन्तः ।
पिता पुत्रं मातुलं भागिनेयो
भ्राता चैव भ्रातरं प्रैतु राजन् ॥ ५४ ॥
‘राजन्! मेरे जीवनका अन्त होनेसे प्रजाओंमें शान्ति हो जाय। सब राजा प्रसन्नतापूर्वक एक-दूसरेसे मिलें। पिता पुत्रसे, भानजा मामासे और भाई भाईसे मिले ।। ५४ ।।
न चेदेवं प्राप्तकालं वचो मे