महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2247, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'पाण्डुनन्दन अर्जुन मनस्वी, बलवान्, शूरवीर, अस्त्रविद्याके पण्डित, शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले, दूरतकका लक्ष्य बेधनेवाले, सुदृढ़ बाणोंका संग्रह रखनेवाले तथा शुभाशुभ निमित्तोंके ज्ञाता हैं ।। २२ ।।
अजेयः समरे चापि देवैरपि सवासवैः ।
बलवान् बुद्धिमांश्चैव जितक्लेशो युधां वरः ।। २३ ।।
'इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी उन्हें युद्धमें पराजित नहीं कर सकते। वे बलवान्, बुद्धिमान्, क्लेशोंपर विजय पानेवाले और योद्धाओंमें श्रेष्ठ हैं ।। २३ ।।
विजयी च रणे नित्यं भैरवास्त्रश्च पाण्डवः ।
तस्य मार्गं परिहरन् द्रुतं गच्छ यतव्रत ।। २४ ।।
'उन्हें युद्धमें सदा विजय प्राप्त होती है। पाण्डुनन्दन अर्जुनके अस्त्र बड़े भयंकर हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुत्र! इसलिये तुम उनका रास्ता छोड़कर शीघ्र भीष्मजीकी रक्षाके लिये चले जाओ ।। २४ ।।
पश्याद्यैतन्महाघोरे संयुगे वैशसं महत् ।
हेमचित्राणि शूराणां महान्ति च शुभानि च ।। २५ ।।
कवचान्यवदीर्यन्ते शरैः संनतपर्वभिः ।
छिद्यन्ते च ध्वजाग्राणि तोमराश्च धनूंषि च ।। २६ ।।
'देखो, इस महाघोर संग्राममें आज यह कैसा महान् जनसंहार हो रहा है? शूरवीरोंके स्वर्णजटित, शुभ एवं महान् कवच अर्जुनके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा विदीर्ण किये जा रहे हैं। ध्वजके अग्रभाग, तोमर और धनुषोंके टुकड़े-टुकड़े किये जा रहे हैं ।। २५-२६ ।।
प्रासाश्च विमलास्तीक्ष्णाः शक्तयश्च कनकोज्ज्वलाः ।
वैजयन्त्यश्च नागानां संक्रुद्धेन किरीटिना ।। २७ ।।
'चमकीले प्रास, सुवर्णजटित होनेके कारण सुनहरी कान्तिसे प्रकाशित होनेवाली तीखी शक्तियाँ और हाथियोंपर फहराती हुई वैजयन्ती पताकाएँ क्रोधमें भरे हुए किरीटधारी अर्जुनके द्वारा छिन्न-भिन्न की जा रही हैं ।। २७ ।।
नायं संरक्षितुं कालः प्राणान् पुत्रोपजीविभिः ।
याहि स्वर्गं पुरस्कृत्य यशसे विजयाय च ।। २८ ।।
'बेटा! आश्रित रहकर जीविका चलानेवाले पुरुषोंके लिये यह अपने प्राणोंकी रक्षाका अवसर नहीं है। तुम स्वर्गको सामने रखकर यश और विजयकी प्राप्तिके लिये भीष्मजीके पास जाओ ।। २८ ।।
रथनागहयावर्तां महाघोरां सुदुर्गमाम् ।
रथेन संग्रामनदीं तरत्येष कपिध्वजः ।। २९ ।।
'यह युद्ध एक महाघोर और अत्यन्त दुर्गम नदीके समान है। उसमें रथ, हाथी और घोड़े भँवर हैं, कपिध्वज अर्जुन रथरूपी नौकाके द्वारा इसे पार कर रहे हैं ।। २९ ।।