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सर्वकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2205, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2205

वे वीर पाण्डव इस प्रकार सलाह करके सब एक साथ मिलकर अपने पिता पाण्डुके भी पितृतुल्य भीष्मपितामहके पास गये; उनके साथ पराक्रमी भगवान् वासुदेव भी थे॥ ५६॥

विमुक्तशस्त्रकवचा भीष्मस्य सदनं प्रति।
प्रविश्य च तदा भीष्मं शिरोभिः प्रणिपेदिरे॥ ५७॥
उन सबने अस्त्र-शस्त्र और कवच रख दिये थे। वे भीष्मके शिविरकी ओर गये और उसके भीतर प्रवेश करके उन्होंने भीष्मको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया॥ ५७॥

पूजयन्तो महाराज पाण्डवा भरतर्षभम्।
प्रणम्य शिरसा चैनं भीष्मं शरणमभ्ययुः॥ ५८॥
महाराज! पाण्डवोंने भरतश्रेष्ठ भीष्मकी पूजा करते हुए उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और उन्हींकी शरण ली॥ ५८॥

तानुवाच महाबाहुर्भीष्मः कुरुपितामहः।
स्वागतं तव वार्ष्णेय स्वागतं ते धनंजय॥ ५९॥
स्वागतं धर्मपुत्राय भीमाय यमयोस्तथा।
किं वा कार्यं करोम्यद्य युष्माकं प्रीतिवर्धनम्॥ ६०॥
(युद्धादन्यत्र हे वत्साः व्रियन्तां मा विशङ्कथ।)
सर्वात्मनापि कर्तास्मि यदपि स्यात् सुदुष्करम्।
उस समय कुरुकुलके पितामह महाबाहु भीष्मने उन सब लोगोंसे कहा—'वृष्णिनन्दन! आपका स्वागत है। धनंजय! तुम्हारा भी स्वागत है। धर्मपुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन और नकुल-सहदेव सबका स्वागत है। आज मैं तुम सब लोगोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला कौन-सा कार्य करूँ। पुत्रो! युद्धके अतिरिक्त जो चाहो, माँग लो, संकोच न करो। तुम्हारी माँग अत्यन्त दुष्कर हो तो भी मैं उसे सब प्रकारसे पूर्ण करूँगा'॥ ५९-६० १/२॥

तथा ब्रुवाणं गाङ्गेयं प्रीतियुक्तं पुनः पुनः॥ ६१॥
उवाच राजा दीनात्मा प्रीतियुक्तमिदं वचः।
गंगानन्दन भीष्म जब बारंबार इस प्रकार प्रसन्नता-पूर्वक कह रहे थे, उस समय राजा युधिष्ठिरने दीन हृदयसे प्रेमपूर्वक यह बात कही—॥ ६१ १/२॥

कथं जयेम सर्वज्ञ कथं राज्यं लभेमहि॥ ६२॥
'सर्वज्ञ! युद्धमें हमारी जीत कैसे हो? हम किस प्रकार राज्य प्राप्त करें?॥ ६२॥

प्रजानां संशयो न स्यात् कथं तन्मे वद प्रभो।
भवान् हि नो वधोपायं ब्रवीतु स्वयमात्मनः॥ ६३॥
प्रभो! हमारी प्रजाका जीवन संकटमें न पड़े, यह कैसे सम्भव हो सकता है? कृपया यह सब मुझे बताइये। आप स्वयं ही हमें अपने वधका उपाय बताइये॥ ६३॥

भवन्तं समरे वीर विषहेम कथं वयम्।