महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1949, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदेको बहुभिर्युद्धे समसज्जदभीतवत् ॥ २२ ॥
वहाँ हम सबने सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवाका अद्भुत पराक्रम देखा। वह अकेला होनेपर भी बहुत-से वीरोंके साथ निर्भीक-सा युद्ध करता रहा ॥ २२ ॥
विसृज्य शरवृष्टिं तां दश राजन् महारथाः ।
परिवार्य महाबाहुं निहन्तुमुपचक्रमुः ॥ २३ ॥
राजन्! उन दस महारथियोंने वहाँ बाणोंकी वर्षा करके महाबाहु भूरिश्रवाको चारों ओरसे घेरकर उसे मार डालनेकी तैयारी की ॥ २३ ॥
सौमदत्तिस्ततः क्रुद्धस्तेषां चापानि भारत ।
चिच्छेद समरे राजन् युध्यमानो महारथैः ॥ २४ ॥
भरतवंशिनरेश! उस समय क्रोधमें भरे हुए भूरिश्रवाने उन महारथियोंके साथ युद्ध करते हुए ही समरभूमिमें उनके धनुष काट डाले ॥ २४ ॥
अथैषां छिन्नधनुषां शरैः संनतपर्वभिः ।
चिच्छेद समरे राजन् शिरांसि भरतर्षभ ॥ २५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इनके धनुष कट जानेपर झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे भूरिश्रवाने उनके मस्तक भी समर-भूमिमें काट गिराये ॥ २५ ॥
ते हता न्यपतन् राजन् वज्रभग्ना इव द्रुमाः ।
तान् दृष्ट्वा निहतान् वीरो रणे पुत्रान् महाबलान् ॥ २६ ॥
वार्ष्णेयो विनदन् राजन् भूरिश्रवसमभ्ययात् ।
राजन्! वे दसों वीर वज्रके मारे हुए वृक्षोंकी भाँति रणभूमिमें मरकर गिर पड़े। उन महाबली पुत्रोंको संग्राममें मारा गया देख वीरवर सात्यकिने गर्जना करते हुए वहाँ भूरिश्रवापर आक्रमण किया ॥ २६ १/२ ॥
रथं रथेन समरे पीडयित्वा महाबलौ ॥ २७ ॥
तावन्योन्यं हि समरे निहत्य रथवाजिनः ।
विरथावभिवल्गन्तौ समेयातां महारथौ ॥ २८ ॥
वे दोनों महाबली समरांगणमें अपने रथके द्वारा दूसरेके रथको पीड़ा देने लगे। उन्होंने आपसमें एक-दूसरेके रथ और घोड़ोंको नष्ट कर दिया। इस प्रकार रथहीन हुए वे दोनों महारथी उछलते-कूदते हुए एक-दूसरेका सामना करने लगे ॥ २७-२८ ॥
प्रगृहीतमहाखड्गौ तौ चर्मवरधारिणौ ।
शुशुभाते नरव्याघ्रौ युद्धाय समवस्थितौ ॥ २९ ॥
वे दोनों पुरुषसिंह हाथमें बड़ी-बड़ी तलवारें और सुन्दर ढालें लिये युद्धके लिये उद्यत होकर बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ २९ ॥
(खड्गप्रहारैः सुभृशं जघ्नतुश्च परस्परम् ।
पीडितौ खड्गघाताभ्यां स्रवद् रक्तौ क्षितौ भृशम् ॥