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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1830, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1830

अनेकशतसाहस्रं समपश्यन्त लाघवात् ।। २३ ।।
युद्धमें शूरवीर भीष्म यद्यपि अकेले थे, तथापि सृञ्जयोंसहित पाण्डवोंको वे अपनी फुर्तीके कारण कई लाख व्यक्तियोंके समान दिखायी दिये ।। २३ ।।
मायाकृतात्मानमिव भीष्मं तत्र स्म मेनिरे ।
पूर्वस्यां दिशि तं दृष्ट्वा प्रतीच्यां ददृशुर्जनाः ।। २४ ।।
लोगोंको ऐसा मालूम हो रहा था कि रणक्षेत्रमें भीष्मजीने मायासे अपनेको अनेक रूपोंमें प्रकट कर लिया है। जिन लोगोंने उन्हें पूर्वदिशामें देखा था, उन्हीं लोगोंको अखि फिरते ही वे पश्चिममें दिखायी दिये ।।
उदीच्यां चैवमालोक्य दक्षिणस्यां पुनः प्रभो ।
एवं स समरे शूरो गाङ्गेयः प्रत्यदृश्यत ।। २५ ।।
प्रभो! बहुतोंने उन्हें उत्तर दिशामें देखकर तत्काल ही दक्षिण दिशामें भी देखा। इस प्रकार समरभूमिमें वे शूरवीर गंगानन्दन भीष्म सब ओर दिखायी दे रहे थे ।। २५ ।।
न चैवं पाण्डवेयानां कश्चिच्छक्नोति वीक्षितुम् ।
विशिखानेव पश्यन्ति भीष्मचापच्युतान् बहून् ।। २६ ।।
पाण्डवोंमेंसे कोई भी उन्हें देख नहीं पाता था। सब लोग भीष्मजीके धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंको ही देखते थे ।। २६ ।।
कुर्वाणं समरे कर्म सूद्यानं च वाहिनीम् ।
व्याक्रोशन्त रणे तत्र नरा बहुविधा बहु ।। २७ ।।
अमानुषेण रूपेण चरन्तं पितरं तव ।
उस समय रणक्षेत्रमें अद्भुत कर्म करते हुए आपके ताऊ भीष्म अमानुषरूपसे विचरते तथा पाण्डव-सेनाका संहार करते थे। वहाँ अनेक प्रकारके मनुष्य उनके सम्बन्धमें नाना प्रकारकी बातें कर रहे थे ।। २७ १/२ ।।
शलभा इव राजानः पतन्ति विधिचोदिताः ।। २८ ।।
भीष्माग्निमभिसंक्रुद्धं विनाशाय सहस्रशः ।
वहाँ विधातासे प्रेरित होकर पतंगोंके समान सहस्रों राजा क्रोधमें भरे हुए भीष्मरूपी प्रचण्ड अग्निमें अपने विनाशके लिये स्वयं ही आ गिरते थे ।। २८ १/२ ।।
न हि मोघः शरः कश्चिदासीद् भीष्मस्य संयुगे ।। २९ ।।
नरनागाश्वकायेषु बहुत्वाल्लघुयोधिनः ।
युद्धमें मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंके शरीरोंपर चलाया हुआ भीष्मका कोई भी बाण व्यर्थ नहीं होता था। एक तो उनके पास बाण बहुत थे और दूसरे वे बड़ी फुर्तीसे चलाते थे ।। २९ १/२ ।।
(प्रच्छादयन् शरान् भीष्मो निशितान् कङ्कपत्रिणः ।)
भिनत्त्येकेन बाणेन सुमुखेन पतत्रिणा ।। ३० ।।

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