महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1815, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रजानाथ! उस रणक्षेत्रमें अनुमानसे, संकेतोंसे तथा नाम और गोत्रोंके उच्चारणसे अपने या पराये पक्षका निश्चय करके जहाँ-तहाँ युद्ध हो रहा था ॥ ७ ॥
न व्यूहो भिद्यते तत्र कौरवाणां कथंचन ।
रक्षितः सत्यसंधेन भारद्वाजेन संयुगे ॥ ८ ॥
सत्यप्रतिज्ञ भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यके द्वारा सुरक्षित होनेके कारण कौरव-सेनाका व्यूह किसी प्रकार भंग न हो सका ॥ ८ ॥
तथैव पाण्डवानां च रक्षितः सव्यसाचिना ।
नाभिद्यत महाव्यूहो भीमेन च सुरक्षितः ॥ ९ ॥
इसी तरह सव्यसाची अर्जुन और भीमसे सुरक्षित पाण्डवोंके महाव्यूहका भी भेदन न हो सका ॥ ९ ॥
सेनाग्रादपि निष्पत्य प्रायुध्यंस्तत्र मानवाः ।
उभयोः सेनयो राजन् व्यतिषक्तरथद्विपाः ॥ १० ॥
वहाँ सेनाके अग्रभागसे भी निकलकर (व्यूह छोड़कर) वीर सैनिक युद्ध करते थे। राजन्! दोनों सेनाओंके रथ और हाथी परस्पर भिड़ गये ॥ १० ॥
हयारोहैर्हयारोहाः पात्यन्ते स्म महाहवे ।
ऋष्टिभिर्विमलाभिश्च प्रासैरपि च संयुगे ॥ ११ ॥
उस महासमरमें घुड़सवार घुड़सवारोंको चमकीली ऋष्टियों और प्रासोंद्वारा मार गिराते थे ॥ ११ ॥
रथी रथिनमासाद्य शरैः कनकभूषणैः ।
पातयामास समरे तस्मिन्नतिभयङ्करे ॥ १२ ॥
वह संग्राम अत्यन्त भयानक हो रहा था। उसमें रथी रथियोंके सामने जाकर उन्हें स्वर्णभूषित बाणोंसे मार गिराते थे ॥ १२ ॥
गजारोहा गजारोहान् नाराचशरतोमरैः ।
संसक्तान् पातयामासुस्तव तेषां च सर्वशः ॥ १३ ॥
आपके और पाण्डव-पक्षके हाथीसवार अपनेसे भिड़े हुए विपक्षी हाथीसवारोंको सब ओरसे नाराच, बाण और तोमरोंकी मारसे धराशायी कर देते थे ॥ १३ ॥
कश्चिदुत्पत्य समरे वरवारणमास्थितः ।
केशपक्षे परामृश्य जहार समरे शिरः ॥ १४ ॥
कोई योद्धा रणक्षेत्रमें उछलकर बड़े-बड़े हाथियोंपर चढ़ जाता और विपक्षी योद्धाके केशोंको पकड़कर उसका सिर काट लेता था ॥ १४ ॥
अन्ये द्विरददन्ताग्रनिर्भिन्नहृदया रणे ।
वेमुश्च रुधिरं वीरा निःश्वसन्तः समन्ततः ॥ १५ ॥