महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1812, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिमन्युस्ततः शूर इरावांश्च ततः परम् ।। १६ ।।
राजन्! तदनन्तर सात्यकि और द्रौपदीके पाँचों पुत्र खड़े हुए। इनके बाद शूरवीर अभिमन्यु और अभिमन्युके बाद इरावान् थे ।। १६ ।।
भैमसेनिस्ततो राजन् केकयाश्च महारथाः ।
ततोऽभूद् द्विपदां श्रेष्ठो वामं पार्श्वमुपाश्रितः ।। १७ ।।
सर्वस्य जगतो गोप्ता गोप्ता यस्य जनार्दनः ।
नरेश्वर! इरावान्के बाद भीमसेनपुत्र घटोत्कच तथा महारथी केकय खड़े हुए। तत्पश्चात् मनुष्योंमें श्रेष्ठ अर्जुन उस व्यूहके बायें पार्श्व या शिखरके स्थानमें खड़े हुए, जिनके रक्षक सम्पूर्ण जगत्का पालन करनेवाले साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण हैं ।। १७ १/२ ।।
एवमेतं महाव्यूहं प्रत्यव्यूहन्त पाण्डवाः ।। १८ ।।
वधार्थं तव पुत्राणां तत्पक्षं ये च सङ्गताः ।
इस प्रकार पाण्डवोंने आपके पुत्रों तथा उनके पक्षमें आये हुए अन्यान्य भूपालोंके वधके लिये इस महाव्यूहकी रचना की ।। १८ १/२ ।।
ततः प्रवृत्ते युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् ।। १९ ।।
तावकानां परेषां च निघ्नतामितरेतरम् ।
तदनन्तर एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंका घोर युद्ध आरम्भ हो गया, जिसमें रथसे रथ और हाथीसे हाथी भिड़ गये थे ।। १९ १/२ ।।
ह्यौघाश्च रथौघाश्च तत्र तत्र विशाम्पते ।। २० ।।
सम्पतन्तो व्यदृश्यन्त निघ्नन्तस्ते परस्परम् ।
प्रजानाथ! जहाँ-तहाँ सब ओर घोड़ों और रथोंके समुदाय एक-दूसरेपर टूटते और प्रहार करते दिखायी दे रहे थे ।। २० १/२ ।।
धावतां च रथौघानां निघ्नतां च पृथक् पृथक् ।। २१ ।।
बभूव तुमुलः शब्दो विमिश्रो दुन्दुभिस्वनैः ।
दिवस्पृङ् नरवीराणां निघ्नतामितरेतरम् ।
सम्प्रहारे सुतुमुले तव तेषां च भारत ।। २२ ।।
भारत! दौड़ते तथा पृथक्-पृथक् प्रहार करते हुए रथसमूहोंका शब्द दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे मिलकर और भी भयंकर हो गया। आपके और पाण्डवोंके घमासान युद्धमें परस्पर आघात-प्रत्याघात करनेवाले नरवीरोंका भयानक शब्द आकाशमें व्याप्त हो रहा था ।। २१-२२ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि तृतीये युद्धदिवसे
परस्परव्यूहरचनायां षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५६ ।।