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सर्वकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1702, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1702

भरतश्रेष्ठ! उस समय मैंने द्रोणाचार्यके उन शिष्योंकी फुर्ती देखी। वे बड़ी तीव्र गतिसे बाण छोड़ते और लक्ष्यको बींध डालते थे॥ २१॥
नोपशाम्यति निर्घोषो धनुषां कूजतां तथा।
विनिश्चेरुः शरा दीप्ता ज्योतींषीव नभस्तलात्॥ २२॥
वहाँ टंकार करते हुए धनुषोंके शब्द कभी शान्त नहीं होते थे। आकाशसे नक्षत्रोंके समान उन धनुषोंसे चमकीले बाण प्रकट हो रहे थे॥ २२॥
सर्वे त्वन्ये महीपालाः प्रेक्षका इव भारत।
ददृशुर्दर्शनीयं तं भीमं ज्ञातिसमागमम्॥ २३॥
भरतनन्दन! दूसरे सब राजालोग उस कुटुम्बीजनोंके भयंकर दर्शनीय संग्रामको दर्शककी भाँति देखने लगे॥ २३॥
ततस्ते जातसंरम्भाः परस्परकृतागसः।
अन्योन्यस्पर्धया राजन् व्ययाच्छन्त महारथाः॥ २४॥
राजन्! बाल्यावस्थामें वे सभी एक-दूसरेका अपराध कर चुके थे। सबका स्मरण हो आनेसे वे सभी महारथी रोषमें भर गये और एक-दूसरेके प्रति स्पर्धा रखनेके कारण युद्धमें विजयी होनेके लिये विशेष परिश्रम करने लगे॥ २४॥
कुरुपाण्डवसेने ते हस्त्यश्वरथसंकुले।
शुशुभाते रणेऽतीव पटे चित्रार्पिते इव॥ २५॥
हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई कौरव-पाण्डवोंकी वे सेनाएँ पटपर अंकित हुई चित्रमयी सेनाओंकी भाँति उस रणभूमिमें विशेष शोभा पा रही थीं॥ २५॥
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे प्रगृहीतशरासनाः।
सहसैन्याः समापेतुः पुत्रस्य तव शासनात्॥ २६॥
तदनन्तर आपके पुत्र दुर्योधनकी आज्ञासे अन्य सब राजा भी हाथमें धनुष-बाण लिये सेनाओंसहित वहाँ आ पहुँचे॥ २६॥
युधिष्ठिरेण चादिष्टाः पार्थिवास्ते सहस्रशः।
विनदन्तः समापेतुः पुत्रस्य तव वाहिनीम्॥ २७॥
इसी प्रकार युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर सहस्रों नरेश गर्जना करते हुए आपके पुत्रकी सेनापर टूट पड़े॥ २७॥
उभयोः सेनयोस्तीव्रः सैन्यानां स समागमः।
अन्तर्धीयत चादित्यः सैन्येन रजसाऽऽवृतः॥ २८॥
उन दोनों सेनाओंका वह संघर्ष अत्यन्त दुःसह था। सेनाकी धूलसे आच्छादित हो सूर्यदेव अदृश्य हो गये॥ २८॥
प्रयुद्धानां प्रभग्नानां पुनरावर्तिनामपि।
नात्र स्वेषां परेषां वा विशेषः समदृश्यत॥ २९॥