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सर्वकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 137

शत्रुदमन शक्र! इस प्रकार दुरात्मा नहुष देवताओंके राज्यसे भ्रष्ट हो गया। ब्राह्मणोंका कण्टक मारा गया। सौभाग्यकी बात है कि अब हमलोगोंकी वृद्धि हो रही है।।
त्रिविष्टपं प्रपद्यस्व पाहि लोकाञ्छचीपते ।
जितेन्द्रियो जितामित्रः स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ १९ ॥
शचीपते! अब आप अपनी इन्द्रियों और शत्रुओंपर विजय पा गये हैं। महर्षिगण आपकी स्तुति करते हैं, अतः आप स्वर्गलोकमें चलें और तीनों लोकोंकी रक्षा करें ।। १९ ।।

शल्य उवाच

ततो देवा भृशं तुष्टा महर्षिगणसंवृताः ।
पितरश्चैव यक्षाश्च भुजगा राक्षसास्तथा ॥ २० ॥
गन्धर्वा देवकन्याश्च सर्वे चाप्सरसां गणाः ।
सरांसि सरितः शैलाः सागराश्च विशाम्पते ॥ २१ ॥
शल्य कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर महर्षियोंसे घिरे हुए देवता, पितर, यक्ष, नाग, राक्षस, गन्धर्व, देवकन्याएँ तथा समस्त अप्सराएँ बहुत प्रसन्न हुईं। सरिताएँ, सरोवर, शैल और समुद्र भी बहुत संतुष्ट हुए ।। २०-२१ ।।
उपागम्याब्रुवन् सर्वे दिष्ट्या वर्धसि शत्रुहन् ।
हतश्च नहुषः पापो दिष्ट्यागस्त्येन धीमता ।
दिष्ट्या पापसमाचारः कृतः सर्पो महीतले ॥ २२ ॥
वे सब लोग इन्द्रके पास आकर बोले—‘शत्रुहन्! आपका अभ्युदय हो रहा है, यह सौभाग्यकी बात है। बुद्धिमान् अगस्त्यजीने पापी नहुषको मार डाला और उस पापाचारीको पृथ्वीपर सर्प बना दिया, यह भी हमारे लिये बड़े हर्ष तथा सौभाग्यकी बात है’ ।। २२ ।।

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्रागस्त्यसंवादे नहुषभ्रंशे
सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें इन्द्र और अगस्त्यके संवादके प्रसंगमें नहुषके पतनसे सम्बन्ध रखनेवाला सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७ ।।

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